पं. लच्छू महाराज अगर समय से अस्पताल पहुंच जाते तो उनकी जान बचाई जा सकती थी। तीन दिन लगातार कष्ट में रहने के बाद भी इस पीड़ा को उन्होंने न तो किसी से साझा किया न ही अस्पताल गए। यह कहना है 24 घंटे उनके साथ रहने वाले उनके शिष्य दीपक का। अंतिम समय एपेक्स हॉस्पिटल में लच्छू महाराज के साथ भतीजे सौरभ और दीपक ही थे।
करीब चार वर्ष से लच्छू महाराज के साथ छाया की तरह रहने वाले उनके नेपाली शिष्य दीपक ने गुरुवार को उनके अंतिम दिनों के संघर्ष को ‘अमर उजाला’ से साझा किया। बताया कि 19 जुलाई को गुरु पूर्णिमा पर दालमंडी वाले आवास पर शिष्यों का जमावड़ा लगा था। गुरु जी ने शिष्यों को आशीर्वाद दिया और आगे बढ़ने के लिए ईमानदारी से रियाज करने की सीख दी। इसके बाद सासाराम (बिहार) के कुछ शिष्यों का आग्रह था कि वहां भी गुरु पूर्णिमा मनाई जाए।
इसके लिए गुरु जी को सासाराम बुलाया जा रहा था। वह आग्रह को ठुकरा नहीं सके और 21 जुलाई को सासाराम चले गए। 22 जुलाई की शाम को वह बनारस लौटे तो बुखार आ गया था। 23 जुलाई को वह दिन भर बुखार में तपते रहे लेकिन अस्पताल नहीं गए। फिर बुखार उतर गया और उनकी पुरानी दिनचर्या शुरू हो गई। 26 जुलाई को अचानक उनकी तेज सांस चलने लगी।