आजादी के बाद 1952 से लेकर 21वीं सदी के पहले डेढ़ दशक तक राजनीति में एक जाज्वल्यमान नक्षत्र की तरह चमकने वाले नेहरू युगीन राजनेताओं के तारकमंडल के आखिरी तारे की चमक भी अनंत में विलीन हो गई। पंडित नारायण दत्त तिवारी के निधन की सूचना से तमाम देश में उनके प्रशंसकों एवं एक राजनेता के रूप में उनको पहचानने वालों को बेहद दुःख हुआ है। यह दुःख इसलिए भी अधिक हुआ क्योंकि आज 18 अक्तूबर को उनका 94वां जन्मदिन था। सुबह से ही उनके प्रशंसक लखनऊ स्थित उनके आवास पर तथा उनकी पत्नी को फोन करके उनके कुशलक्षेम के विषय में जानकारी कर रहे थे और उनके शतायु होने की कामना कर रहे थे।
पिछले कई महीनों से तिवारी जी अस्वस्थ चल रहे थे। उनको दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स हाॅस्पिटल में भर्ती कराया गया था। पिछले कई दिनों से वह जीवनरक्षक यंत्रों पर थे। अभी 8 अक्तूबर को नेता प्रतिपक्ष डा. इंदिरा हृदयेश ने अपने आवास पर मुझसे बहुत दुःखी मन से तिवारी जी की अवस्था के विषय में चर्चा की थी। उन्होंने मुझे बताया था कि तिवारी जी के इलाज का सारा खर्च आदित्यनाथ योगी सरकार वहन कर रही है। शायद उनका इशारा उस तरफ था कि तिवारी जी के अंतिम दिनों में उत्तराखंड सरकार उनके लिए कुछ नहीं कर सकी जबकि उन्होंने इस राज्य को अपने पैरों पर खड़ा होना सिखलाया। उत्तरप्रदेश के संसदीय इतिहास की तो अपूरणीय क्षति है। विरासत के रूप में राज्य की पहली निर्वाचित विधानसभा के नारायणदत्त एकमात्र जीवित किदवंती थे।
पंडित नारायण दत्त तिवारी का व्यक्तित्व अपने आपमें अनोखा व्यक्तित्व था। 18 अक्तूबर 1925 को उनका जन्म नैनीताल जिले के एक छोटे से गांव बल्यूटी में हुआ था जहां जाने के लिए उस समय संपर्क मार्ग भी नहीं था। उनकी माता चंद्रावती बेहद प्रसन्न थी कि उनके यहां पुत्र ने जन्म लिया। उस समय उनके परिवार के गुरबत के दिन थे। नारायण दत्त के पिता पूर्णानंद बरेली स्थित वन विभाग के वुड वर्किंग इंस्टीट्यूट में हेडक्लर्क के रूप में तैनात थे। 1921 में जब महात्मा गांधी जी बरेली आए थे तब पूर्णानंद तिवारी गोविंद बल्लभ पंत के साथ उनसे मिले थे।
गांधी जी से मिलने के बाद पूर्णानंद पूर्णरूप से स्वाधीनता संग्राम आंदोलन में कूद गए और अंततः उनको सरकारी नौकरी से बेदखल कर दिया गया। मात्र 6 वर्ष की आयु में नारायण दत्त तिवारी से उनकी माता चंद्रावती का साया छिन गया। पिता के कठोर अनुशासन में नारायण दत्त तिवारी का पालन-पोषण हुआ। स्वाभाविक था कि बालक नारायणदत्त तिवारी में देशभक्ति के संस्कार बाल्यकाल से ही पड़ गए। आजादी की लड़ाई में जेल जाने वालो में नारायण दत्त तिवारी अपने समय में सबसे कम उम्र के युवा थे, उस समय उनकी उम्र मात्र 17 वर्ष थी।
नारायण दत्त तिवारी 15 महीनों तक जेल में रहे, जहां उन्होंने भयंकर यातनाएं झेली। इसी दौरान उन्हेें टाइफाइड हो गया और 35 दिनों तक वह तेज बुखार की आगोश में रहे। बच्चा बैरक की भयंकर यातनाओं और टाइफाइड के कारण उनको ’नर्व डेपफनेस’ हो गई, जिसके कारण उनके बायें कान की श्रवणशक्ति हमेशा के लिए चली गई थी। जेल से रिहा होने के कुछ समय बाद नारायणदत्त मात्र 50 रूपये लेकर घरवालों को बिना बताए उच्च शिक्षा प्राप्त करने की उत्कंठा लिए इलाहबाद विश्वविद्यालय चले आए।
इलाहबाद जैसे अनजान शहर में, जहां न कोई पहचान का था और न कोई ठौर ठिकाना था, आकर रहना और इलाहबाद विश्वविद्यालय जैसे विख्यात संस्थान में प्रवेश लेना और वहां से बी.ए., एम.ए. और एल.एल.बी. करना एक रोमांचकारी संघर्षगाथा है। यही नहीं इसी विश्वविद्यालय में नारायणदत्त तिवारी आजादी के बाद 1947 में बने प्रथम छात्र संघ के अध्यक्ष निर्वाचित हुए और विश्वविद्यालय की हीरक जयंती के अवसर पर नारायणदत्त तिवारी ने छात्रसंघ अध्यक्ष के रूप में पंडित जवाहरलाल नेहरू को शाल उढाकर और अभिनंदन पत्र भेंटकर सम्मानित किया।
1952 में पूरे देश में पहली बार आम चुनाव हुए। नारायणदत्त तिवारी मात्र 26 वर्ष की उम्र में उत्तरप्रदेश विधानसभा के लिए चुने जाने वाले सबसे कम उम्र के विधायक थे। वह नैनीताल विधानसभा के लिए निर्वाचित होने वाले प्रथम विधायक थे। सुदूर पर्वतीय क्षेत्र में एक साधनविहीन परिवार में जन्म लेकर भारतीय राजनीति में छा जाने वाले नारायणदत्त तिवारी ने देश के संसदीय इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ी।
भारतीय राजनीति में नारायण दत्त तिवारी एकमात्र राजनेता हैं जिन्हें दो राज्यों में 5 बार मुख्यमंत्री बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इसके अलावा नारायण दत्त आंध्र प्रदेश के राज्यपाल भी रहे। उन्होंने दो राज्यों तथा एक बार केंद्र में कुल मिलाकर 14 बार बजट पेश किया। नोएडा, ग्रेटर नोएडा, ट्रानिका सिटी, मारूति जैसे विकास के नमूने उनकी सोच का परिणाम है। नवोदित उत्तराखंड को नई दिशा देने और यहां औद्योगिकीकरण की नींव रखने के लिए नारायणदत्त तिवारी को हमेशा याद किया जाएगा।
राज्य में दून विश्वविद्यालय, औद्यानिकी विश्वविद्यालय, राजीव गांधी नवोदय विद्यालय, सुशीला तिवारी मेडिकल काॅलेज और श्रीनगर मेडिकल काॅलेज सहित विकास के तमाम मील के पत्थरों पर नारायणदत्त तिवारी का नाम सदैव जीवित रहेगा। कई दशकों तक राजीनीति में छाए रहने के बावजूद नारायणदत्त तिवारी के पास अपने लिए खुद का एक दो कमरों का मकान भी नहीं था जिसमें वह अपने जीवन के अंतिम दिन गुजार पाते। वह ताउम्र सरकार आवासों में रहे। उनके पास निजी संपत्ति कहलाए जाने लायक कुछ भी नहीं था।
धनबल और चकाचैंध वाली राजनीति के इस दौर में शायद नारायणदत्त तिवारी जैसे व्यक्तित्व आज अप्रासंगिक हो गए हों लेकिन इसके बावजूद हम आने वाली नस्लों को नारायण दत्त सरीखे लोगों के त्याग, तपस्या और बलिदान के दम में शिखर छू लेने और उस शिखर पर टिके रहने की कला का थोड़ा ज्ञान और उनमें ऐसा करने का जज्बा पैदा कर सके तो शायद इससे बड़ी श्रद्धांजलि उनके लिए कोई दूसरी नहीं हो सकती।