पाकिस्तान से बांग्लादेश की आजादी
1971 में भारत-पाकिस्तान के बीच जंग और इंदिरा गांधी के साहसिक फैसले को दुनिया यूं ही नहीं याद रखती है। 1971 की लड़ाई के बाद दुनिया के नक्शे पर बांग्लादेश का उदय हुआ। तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान को पश्चिमी पाकिस्तान के शासक अपना हिस्सा नहीं मानते थे, बल्कि उपनिवेश के तौर पर देखते थे।
पाकिस्तान की सेना अपने ही नागरिकों पर जुल्म ढा रही थी। इन सब हालात में पूर्वी पाकिस्तान के लोगों और नेताओं ने भारत से मदद मांगी। इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार ने मदद देने का फैसला किया। इंदिरा गांधी ने तथ्यों का हवाला देकर बताया कि भारत सरकार का फैसला तर्कसंगत था। उनका कहना था कि उस समय चुप्पी का मतलब ही नहीं था।
पूर्वी पाकिस्तान में सेना अत्याचार कर रही थी, पाकिस्तान की अपनी ही सेना अपने नागरिकों को निशाना बना रही थी। सेना के जवान पूर्वी पाकिस्तान की महिलाओं के साथ उनके बड़े बुजुर्गों के सामने ही दुष्कर्म कर रहे थे। अपने फैसले का बचाव करते हुए उन्होंने सवाल करने वाले से पूछा कि जब जर्मनी में हिटलर खुलेआम यहुदियों की हत्या कर रहा था तो उस वक्त पश्चिमी देश शांत तो नहीं बैठे।
यूरोप के दूसरे देश हिटलर के खिलाफ उठ खड़े हुए। कुछ उसी तरह के हालात पूर्वी पाकिस्तान में बन चुके थे और उनके सामने दखल देने के अलावा और कोई चारा नहीं था। वो पूर्वी पाकिस्तान में नरसंहार होते हुए नहीं देख सकती थीं।
बुद्धा स्माइल
वह दिन 18 मई 1974 था जब भारत परमाणु शक्ति बना। गरीब और सपेरों का देश कहे जाना वाले भारत की शक्ति को देख दुनिया चौंक गई। भारत अब परमाणु शक्ति से संपन्न राष्ट्र था। भारत जिस समय तरक्की की नई इबारत लिख रहा था उस वक्त अमेरिका, वियतनाम जैसे शक्तिशाली देश युद्ध में उलझे हुए थे।
लिहाजा भारत के परमाणु परीक्षण की तरफ उसका ध्यान उस वक्त गया, जब भारत ने खुद को परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित किया। अमेरिका इस बात से परेशान था कि उसकी खुफिया एजेंसियां कैसे यह बात पता लगाने में पिछड़ गईं। फिर उसने अपनी शक्ति का दबदबा बनाए रखने के लिए भारत पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए जिसे इंदिरा गांधी ने न केवल स्वीकार किया बल्कि उसे चुनौती के आगे भी निकलीं।
Indira Gandhi-during emergency
आपातकाल का वो काला पन्ना
धीरे-धीरे भारत में असंतोष बढ रहा था। विपक्षी दल तेजी से उभर रहा था। पीएम इंदिरा गांधी को लगने लगा था कि अब उनकी प्रजा उनके विरोध में उतर चुकी है और फिर उन्होंने अपने खिलाफ उठ रही आवाज को दबाने के लिए आपातकाल की मदद ली। आपातकाल के समय देवकांत बरुआ कांग्रेस के अध्यक्ष थे और उन्होंने एक नया नारा दिया इंडिया इज इंदिरा और इंदिरा इज इंडिया।
ऑपरेशन ब्लूस्टार की कहानी
वो इंदिरा ही थीं जिसने पंजाब में फैले उग्रवाद को समाप्त करने के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया और 1984 में स्वर्ण मंदिर पर कब्जा किए उग्रवादियों को निकाल फेंकने के लिए कड़े फैंसले लिए। उन्होंने पवित्र स्थल से उग्रवादियों को बाहर निकाला। जो बाद में उनकी मौत का कारण भी बना।
स्वर्ण मंदिर परिसर पर जरनैल सिंह भिंडरावाला, कोर्ट मार्शल किए गए मेजर जनरल सुभेग सिंह और सिख सटूडेंट्स फेडरेशन ने चारों तरफ मोर्चाबंदी कर ली थी। उन्होंने भारी मात्रा में आधुनिक हथियार और गोला-बारूद भी जमा कर लिया था। इंदिरा आम चुनाव से पहले पंजाब में शांति चाहती थीं, लेकिन ऑपरेशन ब्लू स्टार से सिक्खों की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं।
इंदिरा ने पंजाब आने-जाने वाली सभी यातायात सेवाओं पर रोक लगाई। फोन कोट दिए गए, पूरी तैयारी के बाद विदेशी मीडिया को राज्य के बाहर किया गया। और फिर तीन जून को भारतीय सेना की एक टुकड़ी ने स्वर्ण मंदिर परिसर को घेरा और पूरे शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया। चूंकि पूरे मंदिर में खालिस्तानी आंतकियों का बोलबाला था इसलिए पूरे मंदिर में असलहों का अंदाजा लगाने के लिए मंदिर परिसर में जमकर भारतीय सेना ने गोलीबारी की। 5 जून की रात को सेना और सिख लड़ाकों के बीच असली भिड़त शुरू हुई और जरनैल सिंह भिंडरवाला की मौत हुई। ब्रिटेन की तत्कालीन प्रधानमंत्री मारग्रेट थैचर ने इंदिरा गांधी को ब्रिटेन का पूरा समर्थन दिया था।
आभास था कि वह उनका आखिरी भाषण है
इंदिरा को आभास हो चला था कि उनकी मृत्यु निकट है। 30 अक्टूबर को जब वह भाषण दे रही थीं तो उन्होंने कहा था मैं आज यहां हूं, कल शायद यहां न रहूं। मुझे चिंता नहीं मैं रहूं या न रहूं। मेरा लंबा जीवन रहा है और मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने अपना पूरा जीवन अपने लोगों की सेवा में बिताया है। मैं अपनी आखिरी सांस तक ऐसा करती रहूंगी और जब मैं मरूंगी तो मेरे खून का एक-एक कतरा भारत को मजबूत करने में लगेगा।