क्या कहती है नीति आयोग की रिपोर्ट?
वहीं नीति आयोग की 2019 की 'समग्र जल प्रबंधन सूचकांक रिपोर्ट' देश में जल संकट की गंभीर तस्वीर पेश करती है। रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक भारत की शहरी आबादी 60 करोड़ तक पहुंच जाएगी और घरेलू पानी की मांग दोगुनी हो सकती है। अनुमान है कि उस समय पानी की मांग और आपूर्ति के बीच लगभग 50 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) का अंतर होगा। भारत के 12 प्रमुख नदी बेसिनों में करीब 82 करोड़ (820 मिलियन) लोग उच्च से अत्यधिक जल संकट की स्थिति में जी रहे हैं। दुनिया के सबसे ज्यादा जल संकट झेल रहे 20 बड़े शहरों में से पांच भारत में हैं और कई शहरों में अभी भी 24 घंटे पानी की आपूर्ति उपलब्ध नहीं है। केवल 35 प्रतिशत शहरी घरों में पाइप से पानी की सुविधा है, जबकि बाकी लोग ट्यूबवेल, सार्वजनिक नलों या अन्य स्रोतों पर निर्भर हैं।
देश में जल संकट की क्या स्थिति?
रिपोर्ट के अनुसार, देश के कई राज्य ऐसे हैं जहां पानी का इस्तेमाल उपलब्ध संसाधनों के मुकाबले बहुत ज्यादा हो चुका है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में पानी पर दबाव बेहद ज्यादा है। इसके अलावा महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के कई हिस्से भी गंभीर जल संकट की श्रेणी में आते हैं। इन इलाकों में भूजल तेजी से घट रहा है और पानी के स्रोतों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है।
इसका मतलब है कि इन राज्यों में पानी का इस्तेमाल इतना ज्यादा हो रहा है कि भविष्य में पानी की कमी और गंभीर हो सकती है। खेती, उद्योग और शहरों की जरूरतों के कारण पानी की मांग लगातार बढ़ रही है, जबकि प्राकृतिक रूप से पानी की भरपाई उतनी तेजी से नहीं हो पा रही है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि जहां पानी का अत्यधिक दोहन हो रहा है, वहां सबसे पहले पीने के पानी का संकट पैदा होता है। इसके बाद खेती पर असर पड़ता है और धीरे-धीरे उद्योग भी प्रभावित होने लगते हैं।
जल संकट के बीच इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति
रिपोर्ट यह भी चेतावनी देती है कि आने वाले समय में पानी की कमी के कारण शहरों में जीवन स्तर प्रभावित हो सकता है, उद्योगों को अपने संचालन स्थल बदलने पड़ सकते हैं और राज्यों को पानी की राशनिंग तक करनी पड़ सकती है। बढ़ती आबादी और कमजोर जल ढांचे के बीच यह संकट और गहराने की आशंका है।
ऐसे में इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति और जल संकट के बीच सीधा टकराव दिखाई देने लगा है। एक तरफ सरकार इसे ग्रीन फ्यूल और आत्मनिर्भरता का रास्ता बता रही है, वहीं दूसरी तरफ विशेषज्ञ इसे पानी-आधारित और दीर्घकाल में अस्थिर मॉडल मान रहे हैं। यह बहस अब केवल 'खाद्य बनाम ईंधन' तक सीमित नहीं रही, बल्कि पानी बनाम ईंधन का रूप लेती जा रही है।
सरकार का तर्क है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग से तेल आयात कम होगा, विदेशी मुद्रा की बचत होगी, किसानों को फायदा मिलेगा और कार्बन उत्सर्जन घटेगा। सरकार भविष्य में ज्यादा ब्लेंडिंग, डीजल में इथेनॉल मिलाने और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को बढ़ावा देने पर भी विचार कर रही है। लेकिन मौजूदा हालात में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत जैसे जल संकट से जूझ रहे देश में इतनी पानी-आधारित ईंधन नीति टिकाऊ साबित होगी। ऊर्जा सुरक्षा और जल सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए, यही आने वाले समय की सबसे बड़ी नीति चुनौती बनती दिख रही है।