गरीब अप्रवासी मजदूरों का दर्द पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा को विचलित कर रहा है। पूर्व विदेश सचिव शशांक भी मानते हैं कि ये निर्दोष नीतियों में खामियों की सजा पा रहे हैं।
मिर्जापुर, सोनभद्र समेत उत्तर प्रदेश के तमाम जिलों में मजदूरों, कामगारों के लिए संघर्ष कर रहे दिनकर कपूर का कहना है कि आखिर मजदूरों का इसमें दोष क्या है? कपूर सवाल उठाते हैं कि क्या मजदूर विदेश से हवाई जहाज से कोरोना लेकर आए?
दिनकर कहते हैं कि पहले अमीरों को यह बीमारी विदेश से लगी और इसे गरीबों तक फैला दिया और अब मजदूर इसका वाहक बनकर घूम रहा है। सरकार और नेता आपस में विवाद पैदा करके ध्यान बंटा रहे हैं।
इनकम टैक्स विभाग के पूर्व असिस्टेंट डिप्टी कमिश्नर धनेश कपूर का कहना है कि आप मजदूरों को उनके गांव भेजने या जाने की पूरी घटना देख लीजिए। मुझे तो समझ में नहीं आया कि सरकार ने इतने नियम क्यों बदल डाले।
केंद्र और राज्य में कोई तालमेल ही नहीं दिखा। अब राजनीति करके मुद्दे को टालने की कोशिश हो रही है। धनेश का कहना है कि कहां मार्च के आखिरी सप्ताह में उत्तर प्रदेश सरकार मजदूरों, प्रवासियों को बस से ले जा रही थी।
प्रधानमंत्री ने 'मन की बात' कार्यक्रम में माफी मांग ली तो रुक गया। फिर मजदूरों को राज्य सरकारों की तरफ से अपने स्तर पर ले जाने की पहल शुरू हुई। इसके बाद केंद्र ने राज्यों की मांग पर स्पेशल श्रमिक ट्रेने चलाने का फैसला किया।
इसके टिकट के किराये को लेकर भी खूब राजनीति हुई। इसके बाद केंद्र सरकार ने सूची जारी करना शुरू किया कि किस राज्य ने कितनी ट्रेने मांगी हैं। जब राज्यों ने इस मुद्दे पर केंद्र से सवाल करना शुरू किया तो अब केंद्र सरकार उनके लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलाएगी।
धनेश कपूर कहते हैं सभी मजदूरों को रेलवे स्टेशन तक ले जाने, पंजीकरण कराने, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कराने की जिम्मेदारी, स्टेशन से ले जाकर क्वारंटीन कराने, भोजन आदि देने की जिम्मेदारी तो राज्य सरकारों की है। राज्य सरकारों ने अपना काम किया नहीं, उलटे एक दूसरे पर दोषारोपण में जुटी हैं।
डिपार्टमेंट ऑफ इंडस्ट्रियल प्रमोशन से रिटायर हुए अनिल कुमार का कहना है कि किसी को लॉकडाउन टू तक मजदूरों, कामगारों की सुध नहीं थी। यहां तक कि बिना राशन कार्ड वाले लोगों के लिए कई राज्यों ने नियम तक तय नहीं किए।
वह बताते हैं कि जब डर के कारण मजदूर महानगर छोड़कर जाने लगा, तब लोगों को उनकी याद आई। एमएसएमई मंत्रालय के एक निदेशक स्तर के अधिकारी के अनुसार मजदूरों के अपने बलबूते पलायन शुरू कर देने के बाद सरकार और उद्योग जगत को भी कामकाज ठप हो जाने का खतरा नजर आया।
एक राज्य के मुख्यमंत्री ने स्वीकारा कि प्रधानमंत्री के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान यह मुद्दा बाकायदा उठा। बताते हैं इसके बाद राज्य सरकारों ने अपने स्तर पर मजदूरों को रोकने की कोशिश शुरू की।
कर्नाटक सरकार ने बाकायदा बल प्रयोग तक किया। एमएसएमई मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि यदि सब कुछ योजनाबद्ध ढंग से लोगों की परेशानी का आकलन करके हुआ होता, तो समस्या इतनी गंभीर न होती।
बनारस में संजय सिंह एनजीओ चलाते हैं। विनोद कुमार माहेश्वरी का जूलरी का कारोबार है। डा. एसपी मिश्रा सरकार अस्पताल से हाल सीएमओ के पद से रिटायर हुए हैं। तीनों का मानना है कि सरकारी अस्पताल कोविड-19 के संक्रमितों से भरे हैं।
बनारस, प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र है, लेकिन व्यवस्था की खामी है। क्वारंटीन सेंटर बस जगह घेर कर बना दिए गए हैं। मूलभूत सुविधाओं की भारी कमी है।
बताते हैं क्षेत्र के तमाम लोग अपने स्तर से क्वारंटीन हैं और यह अवधि भी भगवान भरोसे चल रही है। समाज का संपन्न वर्ग भटक रहा है, तो आम मजदूरों की तो क्या ही बात करें?