औषध विभाग निगरानी में जुटा
औषधि विभाग और केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन घरेलू विनिर्माण और अन्य देशों से आयात की जा रही दवाओं की उपलब्धता पर लगातार नजर रखे हुए है। मई माह में सभी दवा निर्माताओं से उत्पादन, भंडार, आपूर्ति और खरीद आदेशों की जानकारी मांगी गई थी। इसके अलावा सभी से मांग और आपूर्ति के बीच के अंतर को कम करने के लिए सभी से सहयोग भी मांगा गया है। जीवन रक्षक दवाओं का ठीक तरीके से स्टॉक हो, इसके लिए हाल ही में सभी प्रमुख विभागों की बैठक भी की। बैठक में ये तय किया गया कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच सीमित भंडार का आवंटन किया जाएगा जिससे कि सभी राज्यों को पर्याप्त दवाई मिल सके। यह प्रक्रिया तब तक चलेगी, जब तक मांग और आपूर्ति के बीच के अंतर को खत्म नहीं कर लिया जाता।
दवा के उत्पादन में हो रही बढ़ोत्तरी
फंगस संक्रमण के इलाज के लिए एक मात्र दवा एंफोटेरिसीन-बी की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए सरकार ने युद्ध स्तर पर तैयारी शुरू कर दी है। केंद्र सरकार देश में ही उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रही है। औषधि विभाग और ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया दवा निर्माताओं की पहचान और वैकल्पिक दवाओं के इंतजाम में जुटे हुए हैं। केंद्र सरकार दवा कंपनियों से संपर्क कर रही है और उन्हें उत्पादन बढ़ाने के लिए कह रही है। मौजूदा दवा निर्माताओं से लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन-बी का उत्पादन बढ़ाने के लिए भी कहा गया है। इसके अलावा वैकल्पिक औषधियों के उत्पादन को बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है।
कौन-कौन कर रहा है दवा का उत्पादन
इस समय देश में लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन-बी दवा के मौजूदा पांच उत्पादक हैं, जिसमें भारत सीरम और वैक्सीन लिमिटेड, सिप्ला, सन फार्मा, बीडीआर फार्मास्यूटिकल्स और लाइफकेयर इनोवेशन शामिल हैं। जून महीने के लिए इन कंपनियों की अपेक्षित आपूर्ति लगभग 2.63 लाख शीशियां हैं। लिपोसोमल फॉर्मूलेशन के निर्माण में एक जटिल प्रक्रिया शामिल होती है और इसका उत्पादन केवल उन्नत तकनीक वाले उद्योग ही कर सकते हैं। डीसीजीआई ने दवा निर्माताओं के संघ से परामर्श के बाद छह और कंपनियों को एम्फोटेरिसिन बी और लिपोसोमल इंजेक्शन के निर्माण की अनुमति जारी की है। इनमें एमक्योर, गुफिक, एलेम्बिक, लाइका, नैटको लिमिटेड और इंटास फार्मा हैं। जून महीने के लिए इन छह नए निर्माताओं की अपेक्षित आपूर्ति लगभग 1.13 लाख शीशियां हैं।
पांच गुना से अधिक बढ़ा उत्पादन
देश में एम्फोटेरिसिन बी लिपोसोमल इंजेक्शन का उत्पादन पांच गुना से अधिक हुआ है। अप्रैल माह में दवा का उत्पादन 62,000 से बढ़कर मई में 1.63 लाख शीशियों तक पहुंच गया है। वहीं, जून के अंत तक 3.75 लाख शीशियों से अधिक उत्पादन होने का अनुमान है। सरकार दवाओं के लगातार उत्पादन बढ़ाने को लेकर दवा निर्माताओं के साथ बैठक भी कर रही है और नियमित तौर पर निगरानी भी रख रही है। सरकार सभी कंपनियों से उत्पादन बढ़ाने और लगातार आपूर्ति सुनिश्चित करने को कह रही है।
विदेश से भी मिल रहा है सहयोग
भारत में दवाइयों की जरुरत के बीच विदेश मंत्रालय भी विदेश स्थित विभिन्न कंपनियों तक पहुंच बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। विदेश मंत्रालय ने एक मिशन चलाकर एम्फोटेरिसिन-बी/ लिपोसोमल, एम्फोटेरिसिन-बी इंजेक्शन के नए स्रोतों और म्यूकर- माइकोसिस के इलाज के लिए वैकल्पिक दवाओं की पहचान की है। ऑस्ट्रेलिया, रूस, जर्मनी, अर्जेंटीना, बेल्जियम और चीन से दवाई खरीद के लिए प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। विदेश मंत्रालय भारत में लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन-बी के उत्पादन से लेकर विदेश से आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहा है।
नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) डॉ. वी.के. पॉल के अनुसार, ये इन्फेक्शन 'म्यूकर' नाम के फंगस की वजह से होता है और इसलिए हम इसे 'म्यूकर- माइकोसिस' कहते हैं। ये बहुत हद तक डायबिटीज के मरीजों में पाया जाता है, अगर किसी को डायबिटीज की बीमारी नहीं है तो बहुत कम आशंका है। यह एक इलाज योग्य रोग है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार ये एक तरह की 'फंगस' या 'फफूंद' होती है, जो प्राय: उन लोगों को होती है, जिनकी कोरोना से इम्यूनिटी कमजोर हो जाती है या जो किसी स्वास्थ्य समस्या के कारण दवाइयां ले रहे हैं और इन दवाइयों की वजह से उनकी इम्यूनिटी या शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो गई है।