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नोटबंदी: सरकार मरने नहीं देती, पेट की आग जीने नहीं देती, आखिर क्या करें?

Sat, 19 Nov 2016 04:49 AM IST
रीता तिवारी/ कोलकाता
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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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मैं लगातार चौथे दिन बैंक में आई हूं। तीन दिन तो बैरंग ही लौटना पड़ा था। आज मिला भी तो दो हजार का महज एक नोट। अब सब्जी और दूध खरीदने के लिए छुट्टे कहां से ले आऊंगी ? 
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68 साल की विधवा देवारती बर्मन अभी-अभी भारतीय स्टेट बैंक की धर्मतल्ला शाखा से दो हजार का एक नोट लेकर बाहर निकली है। उनके पैसे हैं भी और नहीं भी। एक सप्ताह से पुराने नोट बदलवाने के लिए जूझ रहीं देवारती की चिंता अब इस नोट के छुट्टे कराने की है। वैसे वे इस मामले में अकेली नहीं है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के विरोध और नोटबंदी के खिलाफ जोरदार आंदोलन के बावजूद पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता और राज्य के दूसरे शहरों में भी तस्वीर जस की तस है। ममता और दूसरे राजनीतिक दलों के नेता जहां नोटबंदी के बाद राजनीति में जुटे हैं वहीं आम लोग बैंकों के सामने कतार में खड़े होने की वजह से परेशान हैं।

सरकार के तमाम दावों के बावजूद हालात सुधरने की बजाय दिन-ब-दिन बिगड़ते ही जा रहे हैं। पूरे राज्य में इस वजह से अब तक कम से कम आधा दर्जन लोगों की मौत हो चुकी है। किसी की लंबी कतार में दिल की धड़कनें थम गईं तो किसी की बीमारी के चलते। मौत का बहाना चाहे कुछ भी हो, वजह महज एक है, नकदी संकट। बंगाल में शादी का सीजन अभी पिछले सप्ताह ही शुरू हुआ है। लेकिन नोटबंदी की वजह से कई शादियां या तो टूट गई हैं या फिर उनकी तारीख आगे बढ़ानी पड़ी है। और तो और कलकत्ता हाईकोर्ट के एक जज के बेटे को डेंगू होने के बावजूद नोटों की कमी की चलते उसका इलाज नहीं हो रहा है। अस्पतालों में पुराने नोटों के मुद्दे पर मारपीट की घटनाएं आए दिन सामने आ रही हैं।
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72 साल के किंग्शुक दे की कहानी तो और मार्मिक है। पत्नी से तलाक लेने के बाद अदालत के निर्देश पर उनको मुआवजे के तौर पर ढाई लाख रुपये का भुगतान करना था। उन्होंने आठ नवंबर को यह रकम जुटा ली थी अगले दिन भुगतान के लिए। लेकिन उसी दिन पांच सौ व हजार के नोट बंद हो गए। अगले दिन पत्नी ने पुराने नोट लेने से इंकार कर दिया और अदालत की शरण ली। अदालत ने दे को हवालात में भेज दिया। फिलहाल वे बिना किसी अपनी गलती के जेल की रोटियां तोड़ रहे हैं।
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बंगाल के तमाम शहरों में हाहाकार मचा है

फाइल फोटो
बंगाल के तमाम शहरों में हाहाकार मचा है। जब शहरों की हालत यह है तो गांवों की स्थिति समझी जा सकती है। वैसे भी राज्य के झारखंड और बांग्लादेश से लगी सीमा पर बसे गांव बदहाली के शिकार हैं। नोटबंदी के बाद वहां के लोग अब महाजन से औने-पौने दाम पर अनाज के बदले रोजमर्रा की जरूरत का सामान खरीद रहे हैं। पुरुलिया जिले के बाघमुंडी इलाके में रहने वाले रामेश्वर महतो सवाल करते हैं कि आखिर ऐसा कब तक चलेगा? और फिर इसके लिए हमारे पास अनाज का भंडार भी तो नहीं है। हम तो किसी तरह दो जून की रोटी जुटा रहे थे। अचानक यह पहाड़ जैसा संकट सिर पर टूट पड़ा है। ग्रामीण इलाकों में बच्चों की फीस नहीं चुकाने की वजह से कई छात्रों का भविष्य भी अधर में लटक गया है।

देवारती दे और महतो के इन सवालों के जवाब न तो किसी के पास है और न ही किसी के पास उनकी समस्या के समाधान की फुर्सत है। महानगर कोलकाता में अल सुबह बैंकों और चुनिंदा सक्रिय एटीएम काउंटरों के सामने जुटने वाली भीड़ अपनी कहानी खुद बयां करती है। नोटबंदी के 10-12 दिन बाद भी तस्वीर जरा भी नहीं बदली है। अक्सर ऐसा होता है कि एटीएम में घंटों खड़े होने के बाद बारी आने पर नो कैश का बोर्ड मुंह चिढ़ाता नजर आता है। उसके बाद नकदी ले आने वाली गाड़ी के इंतजार में लोग वहीं बैठ कर इंतजार करना मुनासिब समझते हैं। उनमें से ज्यादातर लोगों के की आंखों के सामने अगली सुबह की जरूरत की चीजें घूमती रहती हैं। एक एटीएम के सामने खड़ी सुनंदा घोष कहती हैं कि अपने लंबे जीवन में उन्होंने नकदी का ऐसा संकट कभी नहीं देखा। वे सुबह छह बजे से कतार में खड़ी है। लेकिन पिछले अनुभव के आधार पर यह भरोसा नहीं है कि बारी आने तक उनको पैसे मिलेंगे या नहीं।

सरकार और ई-वालेट कंपनियां लोगों को नकदीविहीन लेन-देन के लिए उकसा रही हैं। लेकिन देवारती का कहना है कि उनके सब्जी वाले, फूल वाले और अखबार वाले को तो पता ही नहीं है कि पेटीएम और फ्रीचार्ज किसी चिड़िया का नाम है। इसके अलावा उन्होंने कार्ड स्वाइप मशीनें देखी जरूर हैं, लेकिन उसे रखने की उनकी औकात नहीं है। वे कहती हैं कि सरकार मरने नहीं देती और पेट की आग जीने नहीं देती। आखिर हम करें भी तो क्या करें? देवारती के इसी सवाल का जवाब तो ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल से लेकर पूरे देश के लोग तलाश रहे हैं।
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