मैं लगातार चौथे दिन बैंक में आई हूं। तीन दिन तो बैरंग ही लौटना पड़ा था। आज मिला भी तो दो हजार का महज एक नोट। अब सब्जी और दूध खरीदने के लिए छुट्टे कहां से ले आऊंगी ?
68 साल की विधवा देवारती बर्मन अभी-अभी भारतीय स्टेट बैंक की धर्मतल्ला शाखा से दो हजार का एक नोट लेकर बाहर निकली है। उनके पैसे हैं भी और नहीं भी। एक सप्ताह से पुराने नोट बदलवाने के लिए जूझ रहीं देवारती की चिंता अब इस नोट के छुट्टे कराने की है। वैसे वे इस मामले में अकेली नहीं है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के विरोध और नोटबंदी के खिलाफ जोरदार आंदोलन के बावजूद पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता और राज्य के दूसरे शहरों में भी तस्वीर जस की तस है। ममता और दूसरे राजनीतिक दलों के नेता जहां नोटबंदी के बाद राजनीति में जुटे हैं वहीं आम लोग बैंकों के सामने कतार में खड़े होने की वजह से परेशान हैं।
सरकार के तमाम दावों के बावजूद हालात सुधरने की बजाय दिन-ब-दिन बिगड़ते ही जा रहे हैं। पूरे राज्य में इस वजह से अब तक कम से कम आधा दर्जन लोगों की मौत हो चुकी है। किसी की लंबी कतार में दिल की धड़कनें थम गईं तो किसी की बीमारी के चलते। मौत का बहाना चाहे कुछ भी हो, वजह महज एक है, नकदी संकट। बंगाल में शादी का सीजन अभी पिछले सप्ताह ही शुरू हुआ है। लेकिन नोटबंदी की वजह से कई शादियां या तो टूट गई हैं या फिर उनकी तारीख आगे बढ़ानी पड़ी है। और तो और कलकत्ता हाईकोर्ट के एक जज के बेटे को डेंगू होने के बावजूद नोटों की कमी की चलते उसका इलाज नहीं हो रहा है। अस्पतालों में पुराने नोटों के मुद्दे पर मारपीट की घटनाएं आए दिन सामने आ रही हैं।
72 साल के किंग्शुक दे की कहानी तो और मार्मिक है। पत्नी से तलाक लेने के बाद अदालत के निर्देश पर उनको मुआवजे के तौर पर ढाई लाख रुपये का भुगतान करना था। उन्होंने आठ नवंबर को यह रकम जुटा ली थी अगले दिन भुगतान के लिए। लेकिन उसी दिन पांच सौ व हजार के नोट बंद हो गए। अगले दिन पत्नी ने पुराने नोट लेने से इंकार कर दिया और अदालत की शरण ली। अदालत ने दे को हवालात में भेज दिया। फिलहाल वे बिना किसी अपनी गलती के जेल की रोटियां तोड़ रहे हैं।