संविधान पीठ में वरिष्ठ जजों को शामिल न किए जाने को लेकर भी असंतोष की बात सामने आ रही है। आमतौर पर ऐसा होता है कि जिस पीठ द्वारा मामले को संविधान पीठ के पास भेजा जाता है तो छोटी पीठ के सदस्यों को उसमें जगह दी जाती है। लेकिन पिछले समय में गठित संविधान पीठ में ऐसा देखने को नहीं मिला और न ही इन चारों वरिष्ठतम जजों को उसका हिस्सा बनाया गया।
यह जरूर है कि संविधान के अनुच्छेद-124 के तहत सुप्रीम कोर्ट के सभी जज बराबर है और किसी जज के चयन पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन पिछले दिनों में गठित संविधान पीठ में कुछ चुनिंदा जजों को ही जगह दी गई। जस्टिस चेलमेश्वर की अध्यक्षता वाली पीठ काफी पहले से आधार से संबंधित कुछ मामलों पर सुनवाई कर रही थी और इसी पीठ ने इस मामले को बड़ी पीठ के पास भेजा था।
लेकिन आधार को लेकर गठित पीठ में जस्टिस चेलमेश्वर का नाम ही नहीं है। माना जा रहा है कि जस्टिस बीएच लोया की हत्या के मामले की जांच से संबंधित याचिका को कोर्ट नंबर-10 (न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ) को भेजने के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के निर्णय ने आग में घी का काम किया। क्योंकि इस तरह अहम राजनीति मामले में 12 वरिष्ठ जजों को नजरअंदाज कर दिया गया।
आमतौर पर नई जनहित याचिकाओं पर इन दिनों या तो चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ सुनवाई करती है या कुछ चुनिंदा पीठ। कानून के जानकारों का यह भी कहना है कि आखिरकार अधिकतर मामले चीफ जस्टिस केपास ही क्यों हैं। चाहे वह अयोध्या मामला हो या रामसेतु चाहे केरल लव जिहाद मामला हो या बीसीसीआई। सहारा, जेपी, यूनिटेक आदि मामले भी चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ के पास ही है।
पहले भी रहे मतभेद
पिछले चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने भी बिरला-सहारा मामले में वरिष्ठ जजों को नजरअंदाज कर न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ के पास भेज दिया था। जस्टिस खेहर ने कालिको पुल की पत्नी के पत्र को याचिका में तब्दील कर कोर्ट नंबर-13 के पास भेज दिया था। उस वक्त भी कोर्ट नंबर-दो से 12 को नजअंदाज कर दिया गया। इससे पहले चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर के वक्त भी वकीलों में इस बात को लेकर असंतोष था कि आखिरकार हर नई जनहित याचिकाओं पर चीफ जस्टिस ही क्यों सुनवाई करते हैं।