पोलियो कार्यक्रम से सीख लेते हुए सीवेज के गंदे पानी की जांच की जाएगी। इससे पता चलेगा, कोरोना कम्युनिटी में कितना फैला है। अमेरिका के नॉत्रडेम यूनिवर्सिटी के काइले जेम्स बिबी के नेतृत्व में 50 शोधकर्ता इस पर काम कर रहे हैं।
मनीष ने बताया कि उन्होंने आईआईटी चेन्नई, रूड़की, गुवाहाटी और जेएनयू दिल्ली को सैंपलिंग का प्रोटोकाल भेजा है। गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्डऔर गुजरात स्टेट बायोटेक्नोलॉजी मिशन उनकी पूरी मदद कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कोरोना से संक्रमित मल या पेशाब त्याग करेगा तो उसमें कोरोना की मौजूदगी का पता लगाना संभव है और इसकी पहचान क्षेत्रवार गंदे पानी की जांच से संभव है। मनीष कहते हैं कि हम गंदे पानी के सैंपल से जिंदा कोरोना वायरस को तो नहीं पकड़ सकते लेकिन उसके आरएनए की पहचान हो सकती है जिसकी जीन सीक्वेंसिंग से ये पता किया जा सकता है कि कोरोना का जेनेटिक मटेरियल पानी में कितना है।