फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

'असतो मा सद्गमय' की प्रार्थना अनिवार्य करना है या नहीं, फैसला सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ करेगी

Mon, 28 Jan 2019 08:24 PM IST
अनिल पांडेय अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली

सार

  • मध्य प्रदेश के वकील ने दायर की याचिका, हिंदू धर्म को बढ़ावा देने का लगाया आरोप
  • हिंदी और संस्कृत भाषा में होती है प्रार्थना, जमीयत उलेमा ए हिंद ने भी दायर की याचिका
  • मुस्लिम बच्चों को हाथ जोड़ने के लिए मजबूर नहीं कर सकते : जमीयत
  • जस्टिस नरीमन ने कहा- असतो मा सद्गमय की प्रार्थना उपनिषद से ली है; सरकार बोली- सुप्रीम कोर्ट में भी संस्कृत के श्लोक लिखे हैं, तो क्या कोर्ट धार्मिक हो गया
विज्ञापन
प्रतीकात्मक तस्वीर
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

देशभर के 1125 केंद्रीय विद्यालयों में हर धर्म के छात्रों के लिए संस्कृत और हिंदी में 'असतो मा सद्गमय' की प्रार्थना अनिवार्य करना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है या नहीं, इसका फैसला अब सुप्रीम कोर्ट के जजों की संविधान पीठ करेगी। जबलपुर के वकील विनायक शाह ने केंद्रीय विद्यालयों में सभी छात्रों के लिए प्रार्थना के नियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रखी है।

विज्ञापन


उनका मानना है कि प्रार्थना हिंदू धर्म पर आधारित है और इसे दूसरे धर्म के बच्चों पर जबरन थोपा जा रहा है। ईसाई स्कूलों में ‘ऑनेस्टी इज द बेस्ट पॉलिसी’ कहा जाता है। साथ ही जमीयत उलेमा ए हिंद ने भी मामले में याचिका दायर कर पक्षकार बनाने की गुहार की है। पिछले साल 10 जनवरी को कोर्ट ने इस पर केंद्र को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।

केंद्र सरकार की ओर से सोमवार को सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में कहा कि केंद्रीय विद्यालयों की प्रार्थना संस्कृत में होने मात्र से किसी धर्म से नहीं जुड़ जाती है। 'असतो मा सद्गमय' धर्मनिरपेक्ष है। यह सार्वभौमिक सत्य के बोल हैं। इस पर जस्टिस आरएफ नरीमन ने कहा कि संस्कृत का यह श्लोक उपनिषद से लिया गया है।
विज्ञापन


जवाब में मेहता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के हर कोर्टरूम में लगे चिह्न पर भी संस्कृत में लिखा है- 'यतो धर्मस्ततो जय:'। यह महाभारत से लिया गया है। इसका मतलब यह तो नहीं हुआ कि सुप्रीम कोर्ट धार्मिक है। संस्कृत को किसी धर्म से जोड़कर नहीं देखना चाहिए।

इसके बाद जस्टिस नरीमन ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े इस मुद्दे पर संविधान पीठ को सुनवाई करनी चाहिए। पीठ गठित करने उन्होंने यह मामला चीफ जस्टिस के पास भेज दिया। याचिका में कहा गया है कि केंद्रीय विद्यालयों में सुबह गाए जाने वाले संस्कृत के गीत एक धर्म विशेष से जुड़े धार्मिक संदेश हैं। संविधान के अनुसार सरकार द्वारा संचालित कोई भी विद्यालय या संस्थान किसी भी विशिष्ट धर्म का प्रचार नहीं कर सकते। इसलिए इस पर रोक लगाई जानी चाहिए।

मुस्लिम बच्चों को हाथ जोड़ने के लिए मजबूर नहीं कर सकते : जमीयत 

जमीयत-उलेमा-ए-हिंद ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर केंद्रीय विद्यालय संगठन के संशोधित एजुकेशन कोड को चुनौती दी है। याचिका में कहा गया है कि केंद्रीय विद्यालयों में प्रार्थना लागू है। इस सिस्टम को नहीं मानने वाले अल्पसंख्यक छात्रों को भी इसे मानना पड़ता है। मुस्लिम बच्चों को हाथ जोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

‘असतो मा सद्गमय’ तो सीधे तौर पर उपनिषद से लिया गया है। -जस्टिस नरीमन 

 

इसे धार्मिक निर्देश नहीं कहा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट का आधिकारिक प्रतीक भी भागवत गीता से लिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के हर जज के पीछे  ‘यतो धर्म ततो जय’ होता है। यानी जहां धर्म है वहां विजय है। इसमें कुछ भी धार्मिक नहीं है। -सॉलिसिटर जनरल

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें