लोकसभा चुनाव 2019 में मुस्लिम धार्मिक नेता बहुत शांत हैं। चुनाव में किसी एक राजनीतिक दल को समर्थन देने वाले मुस्लिम धर्मगुरु भी इस बार किसी का समर्थन करने से कतरा रहे हैं। ऐसा क्यों है और इस चुप्पी का अर्थ क्या है? मुस्लिम समाज में इस समय चल रही हलचल को समझने के लिए विशेष संवाददाता अमित शर्मा ने मुस्लिमों के शीर्ष संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना सैयद अरशद मदनी से मुलाकात की और विभिन्न मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश।
सवाल : मौलाना साहब, लोकसभा चुनाव चल रहा है, लेकिन पहले की तरह इस बार मुस्लिम धर्मगुरुओं ने किसी पार्टी विशेष के लिए वोट करने की बात अब तक नहीं की है? आप क्या अपील करेंगे?
जवाब : माफ कीजियेगा, मैं चुनाव पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा।
सवाल : इस चुप्पी का क्या कारण है? कहीं इससे दूसरे वर्ग के भी ध्रुवीकरण होने की आशंका तो नहीं है?
जवाब : चुनाव के दौरान की गई बातों का अक्सर गलत अर्थों में इस्तेमाल कर लिया जाता है। ऐसा मेरे साथ हुआ है, इसीलिए मैंने आपसे कह दिया कि मैं चुनाव पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा।
सवाल : मायावती जी ने एक धर्म विशेष के लोगों से यह अपील की है कि वो अपने वोट बंटने न दें। आप क्या कहेंगे?
जवाब : ये तो वही जाने जिसने अपील की है। किसी दूसरे की अपील पर मैं क्या टिप्पणी करूं।
सवाल : आप मुस्लिम जमात के बड़े नेता हैं। आपके करोड़ों मानने वाले हैं। उस जमात से आप कोई अपील नहीं करेंगे?
जवाब : मैं सिर्फ मुस्लिम जमात से ही नहीं, पूरे हिन्दुस्तान से यह अपील करना चाहता हूं कि वे अपने मताधिकार का प्रयोग करें। यह उनका अधिकार है जो देश बदलने की क्षमता रखता है। वे जिस भी उम्मीदवार को बेहतर समझें, उसे वोट दें जिससे यह देश सुंदर बन सके। मैं इतना ही अपील करूंगा कि वो वोट जरूर करें।