पूर्वी एशिया में पहले ही समुद्री सीमा विवाद काफी हैं लेकिन अब यहां हवाई सीमा पर भी विवाद बढ़ रहा है। पिछले हफ्ते ही दक्षिण कोरियाई लड़ाकू विमान का सामना सिओल के एयर डिफेंस आईडेंटिफिकेशन जोन में (एडीआईजेड) चीनी और रूसी लड़ाकू विमानों के साथ हो गया।
दिलचस्प बात ये है कि ऐसे हवाई जोन स्थापित करने से रोकने के लिए कोई नियम कानून नहीं है और ना ही ऐसा कोई अंतरराष्ट्रीय कानूनी दिशा निर्देश है। ताजा घटना में बीजिंग और मॉस्को ने सबसे पहले इसी बात की ओर ध्यान दिलाया।
जब दक्षिण कोरिया ने कहा कि चीनी जेट ने सियोल के हवाई जोन में घुसपैठ की है तो चीन ने तुरंत कहा कि ये अंतरराष्ट्रीय हवाई क्षेत्र है जिसमें हर देश हवाई संचालन के लिए आजाद है। अमरीका पहला देश है जिसने 1950 के दशक में एडीआईजेड स्थापित किया था और उसी दशक में उसने दक्षिण कोरिया और जापान के एडीआईजेड भी स्थापित किए।
इसके अलावा इस क्षेत्र में वियतनाम, फिलीपींस और ताईवान के पास भी एडीआईजेड हैं और इंडोनेशिया अपना जोन बनाने की सोच रहा है। साल 2010 में जापान ने अपने एडीआईजेड को योनागुनी द्वीप तक फैला दिया जिस पर ताईवान भी दावा करता रहा है।
इन देशों के समूह में चीन बाद में शामिल हुआ और साल 2013 में उसने पूर्वी चीन सागर में अपना पहला एडीआईजेड स्थापित किया। हालांकि इसके हवाई जोन में एक विशेषता ये है कि यहां से गुजरने वाले सभी विमानों को अपनी पहचान बतानी होगी, चाहे वो कहीं जा रहे हों।
इस जोन में जापान प्रशासित सेनकाकू द्वीप भी शामिल है जिस पर चीन अपना दावा करता रहा है और इसे डियाओयू द्वीप कहता है। इसके साथ ही दक्षिण कोरिया नियंत्रित लियोडो द्वीप भी इसी जोन में आता है।
जब चीन ने अपना एडीआईजेड घोषित किया तो उसके कुछ दिन बाद सियोल ने अपने जोन का विस्तार करते हुए लियोडो को भी शामिल कर लिया। माना जाता है कि दक्षिण कोरिया अपने दावे को मजबूत करना चाहता था।
एक रूसी दैनिक अखबार इजेवस्तिया में 25 जुलाई को एक लेख छपा जिसमें लिखा था, "पिछले दशक में अंतरराष्ट्रीय हवाई सीमा को मनमाने तरीके से अधिग्रहित करने और आइडेंटिफिकेशन जोन के विस्तार का एक ढर्रा सा बन चुका है।"
लेख के अनुसार, "इसका जमीनी सीमा से शायद ही कोई लेना देना है। लेकिन कुछ देशों ने समंदर के ऊपर अपनी सीमा के पास के न्यूट्रल हवाई क्षेत्र को भी अपना स्पेशल हवाई जोन घोषित करना शुरू कर दिया है।"
एडीआईजेड स्थापित करने के पीछे देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा हवाला दिया जाता है। हालांकि इसका कैसे नियमन होगा, इस पर बहुत स्पष्टता नहीं है और इसके इस्तेमाल की इजाजत को दावेदारी के रूप में देखा जाता है, खासकर पूर्वी एशिया में जहां बहुत सारे सीमा विवाद हैं।
इसके पीछे का तर्क ये है कि एडीआईजेड में अगर किसी देश का सीमित प्रभाव है तब भी लंबे समय में इस इलाके पर उसकी दावेदारी को पुष्ट करने के काम आ सकता है। हालांकि चीनी एडीआईजेड को अमरीकी सेना नजरअंदाज करती है लेकिन उस रास्ते का इस्तेमाल करने वाली 60 वाणिज्यिक एयरलाइंस और कुछ अमरीकी युद्धपोत भी अपनी पहचान बताते हैं।
सिंगापुर में एस राजरत्नम स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में डिफेंस एक्सपर्ट कोलिन कोह स्वी लीन के अनुसार, विवादित इलाकों पर अपना दावा जताना प्रत्यक्ष से ज्यादा अप्रत्यक्ष तौर पर होता है।
उन्होंने बीबीसी मॉनीटरिंग को बताया, "एक विदेशी विमान अगर एडीआईजेड के अंदर रडार पर आ गया, भले ही वो वास्तविक हवाई सीमा से बाहर ही क्यों न हो, इलाके पर दावा जताने के लिए उसपर दबाव डाला जा सकता है और उसे लौटाया जा सकता है।"
ऐसी स्थिति 2015 में पैदा हुई थी जब लाओ एयरलाइंस की एक उड़ान को चीन के हवाई सीमा नियंत्रकों ने इसलिए लौटा दिया कि उसके पास पूर्वी चीन सागर के एडीआईजेड से गुजरने का पास नहीं था।
इसके अलावा एडीआईजेड कुछ हद तक विवादित इलाकों के ऊपर हवाई संचालन की वैधता भी प्रदान करता है। उदाहरण के लिए चीन के सैन्य विमान अगर सेनकाकू या डियोयू द्वीप के ऊपर उड़ान भरे तो वो दावा कर सकते हैं कि वो चीनी एडीआईजेड में हैं और जापान के हवाई जोन का उल्लंघन नहीं कर रहे।
ग्रिफिथ एशिया इंस्टीट्यूट में फेलो और रॉयल ऑस्ट्रेलियन एयर फोर्स के पूर्व अधिकारी पीटर लेटन के अनुसार, "चीन का एडीआईजेड असल में सेनकाकू द्वीप पर दावे को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा है।"
उनके मुताबिक, "इसके अलावा, अगर चीन की हवाई गतिविधियों को चुनौती नहीं मिलती, अन्य देश भी धीरे-धीरे इसे स्वीकार कर लेंगे या कम से कम जापान की बजाय इस क्षेत्र पर चीन के दावे को वरीयता देंगे।" एडीआईजेड स्थापित करना एक बात है और इसे लागू करना दूसरी बात क्योंकि इसके लिए सैन्य संसाधन लगाने की जरूरत पड़ती है।
दक्षिण कोरियाई रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इस साल ही चीन और रूसी सेना के विमान अलग-अलग कोरियाई एडीआईजेड में 39 बार घुसे थे। यूएस नावेल कॉलेज के चाइना मैरीटाइम स्टडीज इंस्टीट्यूट में स्ट्रेटेजिक रीसर्चर पीटर डटन एक और बात बताते हैं कि क्यों देश एडीआईजेड को लेकर अधिक संवेदनशील हैं।
उनके मुताबिक, "हालांकि एडीआईजेड जमीनी सीमा से जुड़ी हवाई सीमा नहीं है, लेकिन नक्शे पर कभी भी सीमा खींची जा सकती है और इसे सार्वजनिक किया जा सकता है। और इसका असर ये हो सकता है कि इसकी रक्षा के लिए लोगों की चाहत बढ़ जाएगी।"
जापान एयर सेल्फ डिफेंस फोर्स को अपने एडीआईजेड में अज्ञात विमानों की निगरानी के लिए लगभग हर रोज अपने विमान भेजने पड़ते हैं। 2018 में इसके विमानों ने 999 बार उड़ान भरी।
लेटन का कहना है कि सबसे बड़ी चिंता ये है कि जापानी डिफेंस फोर्स की तुलना में चीन के पास छह गुना लड़ाकू विमान हैं और जब भी वो चाहें घुसपैठ कर सकते हैं। आसमान में सैन्य गतिविधियों के बढ़ने पर ये भी खतरा है कि किसी दुर्घटना से मामला अधिक बिगड़ जाए।
सियोल के एक अखबार 'द कोरिया हेराल्ड' में 24 जुलाई को छपे एक लेख के अनुसार, "इस तरह की संयुक्त सैन्य अभ्यास के नियमित होने की आशंका है और रूस और चीन अन्य देशों के हवाई सुरक्षा जोन को लगातार नजरअंदाज कर रहे हैं। इसकी वजह से वास्तविक भिड़ंत का खतरा मौजूद है।"
चीन ने दक्षिण चीन सागर पर भी एडीआईजेड स्थापित करने का संकेत दिया है, अगर ऐसा होता है तो आसमान में तनाव बढ़ सकता है। हालांकि ये जल्द नहीं होने जा रहा है क्योंकि इसको लागू करना कठिन है और सीमा को लेकर चीन के रणनीतिक लक्ष्य के लिहाज से भी उलटा दांव पड़ सकता है।