मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट के अंतर्गत देश में 20 हफ्ते से ज्यादा पुराने भ्रूण का गर्भपात गैरकानूनी है। यह तभी संभव है जब महिला की जान खतरे में हो। इस कानून के चलते कई महिलाएं छिपकर असुरक्षित तरीके से गर्भपात कराने को मजबूर हैं।
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सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में 56 फीसदी असुरक्षित गर्भपात होते हैं। वहीं 8.5 फीसदी गर्भवती महिलाओं की मृत्यु का कारण असुरक्षित गर्भपात होता है। करीब हर रोज दस महिलाएं इसके चलते जान गंवा देती हैं। इसे रोकने के लिए 2014 में ड्राफ्ट बिल पेश किया गया, जिसमें प्रावधान था कि गर्भपात की समय सीमा 20 हफ्ते से बढ़ाकर 24 हफ्ते की जाए पर अभी तक यह बिल पास नहीं हो सका है।
सुप्रीम कोर्ट के नियम से आया बदलाव
2008 में निकेता मेहता को गर्भावस्था के 24वें हफ्ते में पता चला कि उनके गर्भ में पल रहे भ्रूण का दिल असामान्य है, जिससे उसके जीवित रहने की आशंका कम है। पर बांबे हाईकोर्ट ने उनकी गर्भपात को मंजूरी देने की याचिका खारिज कर दी क्योंकि बच्चे की जान खतरे में थी, महिला की नहीं।
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इस फैसले के बाद तकनीक, कानून, व्यक्तिगत पसंद और नैतिकता पर खूब चर्चा हुई। इस साल जुलाई में बीमार भ्रूण के एक ऐसे ही केस में सुप्रीम कोर्ट ने 20 हफ्ते से ज्यादा उम्र वाले भ्रूण के गर्भपात की इजाजत दे दी।
कानून की जरूरत
सुप्रीम कोर्ट का फैसला समाज में आ रहे बदलाव का प्रतीक है। लेकिन गर्भपात की सीमा 24 हफ्ते करने का विधायी संशोधन तीन साल से लटका पड़ा है। 2014 के इस ड्राफ्ट बिल में रेप के मामलों में 24 हफ्ते तक गर्भपात की इजाजत है। वहीं बीमार भ्रूण के विशेष मामलों में भी यह छूट मिली हुई है। इस संशोधन से गर्भपात सेवा ज्यादा आसान हो जाएगी। आयुर्वेद, यूनानी, होम्योपैथी डॉक्टर और सहायक नर्स, दाई और नर्स भी गर्भपात कर सकेंगी। यह बिल अभी सरकार ने मंजूरी के लिए कैबिनेट के पास भेजा है।