राष्ट्रपति के संदर्भ पर सुप्रीम कोर्ट के गुरुवार को दिए गए फैसले के बाद तेलंगाना में सत्तारूढ़ कांग्रेस के नेताओं ने राज्य सरकार के अन्य प्रस्तावों पर आपत्ति जताई है, जिनमें पिछड़ा वर्ग आरक्षण विधेयक भी शामिल है। पिछड़ा वर्ग आरक्षण विधेयक कथित तौर पर राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा के पास लंबित है।
कांग्रेस सरकार ने 26 सितंबर को चुनावी वादे को पूरा करते हुए स्थानीय निकायों में पिछड़े वर्गों को 42 प्रतिशत आरक्षण देने का आदेश जारी किया। यह सरकारी आदेश इस साल की शुरुआत में राज्य विधानसभा की ओर से पारित दो विधेयकों के बाद आया। इस आदेश में शिक्षा, रोजगार और स्थानीय निकायों में पिछड़ा वर्ग आरक्षण को बढ़ाकर 42 प्रतिशत करने का प्रावधान है।
ये विधेयक राज्यपाल के पास भेज दिए गए हैं और वर्तमान में राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं। मुख्यमंत्री रेड्डी ने 6 अगस्त को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछड़ा वर्ग आरक्षण विधेयकों पर राष्ट्रपति की मंजूरी की मांग करते हुए एक विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया था।
इस दौरान उन्होंने आरोप लगाया था कि भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार 'ओबीसी विरोधी' होने के कारण विधेयकों को रोक रही है। कांग्रेस ने 2023 के तेलंगाना विधानसभा चुनावों से पहले पिछड़ा वर्ग को 42 प्रतिशत आरक्षण देने का वादा किया था। पूर्व क्रिकेटर मोहम्मद अजहरुद्दीन को अगस्त में राज्यपाल कोटे के तहत विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) के रूप में नामित करने का प्रस्ताव भी राज्यपाल के पास लंबित है। हालांकि, राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा ने अभी तक इस नियुक्ति को मंजूरी नहीं दी है।
अजहरुद्दीन ने हाल ही में मंत्री पद की शपथ ली थी, जबकि राज्यपाल की ओर से एमएलसी के रूप में उनके नामांकन को मंजूरी नहीं मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि अदालत राज्य विधानसभाओं की ओर से पारित विधेयकों को मंजूरी देने के लिए राज्यपालों और राष्ट्रपति पर कोई समय-सीमा नहीं थोप सकता।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्यपालों के पास विधेयकों को 'हमेशा के लिए' रोके रखने की 'अनियंत्रित' शक्तियां नहीं हैं। राष्ट्रपति संदर्भ पर अपनी सर्वसम्मत राय में मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि राज्यपालों की ओर से 'अनिश्चितकालीन विलंब' 'सीमित न्यायिक जांच' के दायरे में होगा।
पीठ की ओर से कहा गया कि अनुच्छेद 142 के तहत अपनी पूर्ण शक्ति का उपयोग करके सुप्रीम कोर्ट की ओर से विधेयकों को स्वीकृत नहीं किया जा सकता। इस बीच कांग्रेस विधायक आदि श्रीनिवास ने पीटीआई को बताया कि अब राज्यपाल कार्यालय की ओर से 'लंबित' विधेयकों पर लोगों की चिंताओं के प्रति संवेदनशील होने की स्थिति उत्पन्न हो गई है।
राष्ट्रपति के पास लंबित पिछड़ी जातियों को 42 प्रतिशत आरक्षण प्रदान करने वाले विधेयक और आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा को समाप्त करने वाले विधेयक का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि विधेयकों को मंजूरी देने में 'विलंब' पिछड़े वर्गों के हितों के विरुद्ध है।