तेजस कार्यक्रम को लेकर एक तरफ उत्पादन बढ़ाने की तैयारी है, तो दूसरी तरफ तकनीकी चुनौतियां और देरी चिंता बढ़ा रही हैं। एचएएल ने हर साल 24 विमान बनाने का लक्ष्य रखा है, लेकिन वायुसेना की संतुष्टि के स्तर तक काम पहुंचना अभी बाकी है। ऐसे में 180 विमानों के ऑर्डर के बावजूद सबसे बड़ा सवाल डिलीवरी की रफ्तार को लेकर है। आखिर तेजस की राह में कौन-सी अड़चनें बाकी हैं? पढ़िए रिपोर्ट
अमेरिकी कंपनी जीई एयरोस्पेस ने तेजस मार्क-1ए के लिए तीन और एफ404-आईएन-20 इंजन सौंप दिए हैं। इंजनों की यह आपूर्ति सकारात्मक संकेत है, लेकिन वायुसेना को पहला तेजस मार्क-1ए लड़ाकू विमान कब मिलेगा, इसे लेकर तस्वीर अब तक साफ नहीं है। इन तीन नए इंजनों के साथ जीई की ओर से भेजे गए इंजनों की संख्या 10 हो गई है। इंजन मिलने के बाद भी विमान में उसे लगाने, ग्राउंड टेस्टिंग और उड़ान परीक्षण जैसी जटिल प्रक्रियाओं में समय लगता है, इसलिए पहले विमान की डिलीवरी की तारीख अभी तय नहीं है।
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हर साल 24 विमान बनाने का वादा
एचएएल की एसेंबली लाइनों पर काम जारी है। कंपनी एयरफ्रेम का निर्माण और एवियोनिक्स का एकीकरण पहले ही पूरा कर रही है, ताकि इंजन आने के साथ ही उन्हें फिट किया जा सके। हाल ही में एचएएल के सीएमडी रवि कोटा ने बताया था कि कंपनी फिलहाल हर साल 24 विमानों का स्थिर उत्पादन लक्ष्य हासिल करने पर काम कर रही है।
तकनीकी मोर्चे पर वायुसेना संतुष्ट नहीं
एचएएल 48,000 करोड़ रुपये वाले 83 तेजस मार्क-1ए के शुरुआती ऑर्डर पर काम कर रही है। सरकार की ओर से 97 और विमानों की मंजूरी के बाद कुल ऑर्डर 180 विमानों का हो गया है। तेजस प्रोजेक्ट में लेटलतीफी का सीधा असर वायुसेना की परिचालन तैयारियों पर पड़ रहा है। तकनीकी मोर्चों पर काम अभी वायुसेना की पूरी संतुष्टि के स्तर तक नहीं पहुंचा है। इस बारे में तमाम शिकायतें रही हैं। रक्षा मंत्रालय के अधिकारी ने यहां तक कहा था कि इतनी बार देरी हो चुकी है कि अब रिकॉर्ड रखना ही छोड़ दिया है।