गुजरात दंगे पर निर्णय देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तीस्ता सीतलवाड़ और पुलिस अधिकारी आरबी श्रीकुमार की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने माना है कि तीस्ता सीतलवाड़ ने गुजरात दंगे के मामले को एक साजिश के अंतर्गत लंबे समय तक खींचने की कोशिश की। कोर्ट ने इस मामले में ज्यादा जांच की आवश्यकता भी बताई थी। सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के अगले ही दिन गुजरात पुलिस ने तीस्ता सीतलवाड़ को उनके मुंबई स्थित आवास से गिरफ्तार कर लिया गया। उनके साथ ही गुजरात पुलिस के पूर्व अधिकारी को भी उनके आवास से गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन इस गिरफ्तारी के साथ ही इसका विरोध शुरू हो गया है।
जागरूक नागरिक की भूमिका निभाई
सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा है कि तीस्ता सीतलवाड़ ने एक जागरूक नागरिक की सशक्त भूमिका निभाई है। उन्होंने इसे गुजरात पुलिस के द्वारा बदले की कार्रवाई और केंद्रीय नेताओं के द्वारा अपने विरुद्ध आवाज उठाने वालों पर अनावश्यक दबाव डालने की कार्रवाई बताया है। प्रशांत भूषण ने कहा है कि तीस्ता सीतलवाड़ को केवल इसलिए परेशान किया जा रहा है, क्योंकि उसने गुजरात दंगों के दौरान उनकी भूमिका को उजागर कर दिया था। इसके लिए सीतलवाड़ को अपनी सुरक्षा को भी दांव पर लगाना पड़ा था और इस दौरान उनके साथ कुछ भी हो सकता था।
बदले की कार्रवाई
राजनीतिक कार्यकर्ता और समसामयिक विषयों पर प्रखर प्रवक्ता योगेंद्र यादव ने ट्वीट कर कहा है कि यह ‘बदले की कार्रवाई’ है। उन्होंने इसे अपने खिलाफ आवाज उठाने वालों के खिलाफ की गई एक और कार्रवाई बताया है। उन्होंने कहा है कि यह कार्रवाई उस तीस्ता सीतलवाड़ पर की गई है जिन्होंने गुजरात दंगों के दौरान पीड़ित हुए लोगों की आवाज बनकर उभरीं और लोगों की मदद की। यह मदद केवल लोगों को सुरक्षित रखने और उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने उनके लिए लंबी लड़ाई लड़ी।
एमनेस्टी इंडिया ने कहा- आवाज को दबाने की कोशिश
तीस्ता सीतलवाड़ की गिरफ्तारी को एमनेस्टी इंडिया ने अपने से अलग आवाज को दबाने की कोशिश बताया है। संगठन ने ट्वीट कर कहा है कि पुलिस ने लोगों के मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाली मानवाधिकार कार्यकर्ता सीतलवाड़ को गिरफ्तार कर लिया है। यह अपने से अलग विचार रखने वाली हर आवाज को दबाने की कोशिश है। संगठन ने कहा है कि इस कार्रवाई से सिविल सोसाइटी के उन लोगों में गलत संदेश जाएगा, जो लोगों के अधिकारों के खिलाफ सरकारों की नाकामयाबी को उजागर करते रहते हैं। एमनेस्टी ने इसे स्वीकार न किए जाने योग्य कार्रवाई बताया है।