भारत में अब बहुत ही कम लड़कियां ऐसी हैं जो किशोरावस्था में मां बन रही हैं। साल 2000 के बाद से इसमें 63 फीसदी की कमी आई है। ये जानकारी ग्लोबल चाइल्डहुड रिपोर्ट 2019 से सामने आई है। इस रिपोर्ट को गैर लाभकारी संगठन सेव द चिल्ड्रन ने मंगलवार को जारी किया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2000 की तुलना में भारत में महज 20 लाख जन्म हुए हैं। इस समय अवधि में लगभग तीन-चौथाई किशोरियों के जन्म देने में वैश्विक कमी भारत में ही हुई है।
वैश्विक स्तर पर गर्भावस्था और प्रसव के दौरान आने वाली परेशानियां ही 15 से 19 साल की लड़कियों की मौत का मुख्य कारण होती हैं। वहीं किशोर माताओं से जन्म लेने वाले बच्चों पर भी मौत का खतरा बना रहता है। लेकिन भारत में इस दर में काफी कमी आई है, जो कि देश के लिए खुशी की बात है।
वैश्विक स्तर पर किशोर उम्र में जन्म दर में 22 फीसदी की कमी आई है। जो आंकड़ा साल 2000 में 35 लाख था, वो अब 14 लाख हो गया है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस)-4 द्वारा साल 2015-16 में किए गए सर्वे में 18 साल की उम्र से पहले शादी करने वाली लड़कियों की संख्या 26.8 फीसदी आई, जो कि 2005-06 में 47.7 फीसदी थी।
सेव द चिल्ड्रन ने इस सर्वे में 176 देशों का मूल्यांकन किया है। जिसमें बच्चों की स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, पोषण तक पहुंच, बाल विवाह और बाल मजदूरी जैसे घटकों को शामिल किया गया। साल 2000 के बाद बाल मृत्यु दर में कमी देखी गई है। 'एंड ऑफ चाइल्डहुड इंडेक्स' में भारत का स्कोर 137 पॉइंट है।
सेव द चिल्ड्रन की सीईओ बिदिशा पिल्लई का कहना है कि इस उपलब्धि का असर आने वाली पीढ़ी पर भी जरूर होगा। हालांकि रिपोर्ट में कुपोषण को लेकर स्थिति अच्छी नहीं है। भारत में इसका स्तर अधिक पाया गया है।