राष्ट्रीय स्तर पर पहले भी बड़ी भूमिका निभा चुके हैं नायडू
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू वैसे तो खांटी रूप से गैर कांग्रेस की राजनीति करते हैं। यूनाईटेड फ्रंट की सरकार से लेकर केंद्र की अटल बिहारी वाजपेई की सरकार तक में वे अहम भूमिका निभा चुके हैं।
उनके करीबियों के अनुसार मुस्लिम के रूप में अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति बनाने की सलाह नायडू की ही थी। परदे के पिछे नायडू भाजपा के अन्य सहयोगी दलों के संपर्क में भी थे। भाजपा से अलग होते ही अब उनकी तैयारी भगवा परिवार को बड़ी चोट देने की है।
उनके सामने मजबूरी बस एक ही है कि वे कांग्रेस विरोध की राजनीति भी करते हैं। यही वजह है कि उन्होंने एनडीए में आकर मोदी सरकार में शामिल होने का निर्णय लिया था।
मगर एनडीए के जरिए भाव न दिए जाने से नायडू के मन में नाराजगी है। जबकि देवगौड़ा से लेकर अटल बिहारी वाजपेई तक की सरकार में नायडू की तूती बोलती थी।
यही वजह है कि केंद्र पर आंध्र की उपेक्ष का आरोप लगाते हुए टीडीपी की रणनीति भाजपा से रिश्ते खत्म करने के बने। ताकि अगले चुनाव के लिए सूबे में वह अपनी जमीन बचा सकें। ऐसा करके टीडीपी जगन को भी सियासी नुकसान देना चाहती है।
यदि भाजपा से वे जुड़ते भी हैं तो केंद्र की सत्ता विरोधी रुझान की चपेट उन पर पड़े। टीडीपी को जगन-भाजपा की दोस्ती में भी फायदा नजर आ रहा है।
एक वरिष्ठ टीडीपी नेता के अनुसार अगर जगन और भाजपा का मिलन आंध्र प्रदेश में होता है तो टीडीपी के खाते में बैठे-बिठाए मुस्लिम और ईसाई समुदाय का वोट जुड़ जाएगा। जोकि मुख्य रूप से जगन के समर्थक माने जाते हैं।
टीडीपी नेता के अनुसार आंध्र की राजनीति में कांग्रेस पार्टी अब भी शून्य है। इसलिए उनका मुकाबला जगन की पार्टी से होगा। ऐसे में भाजपा से अलग होकर टीडीपी राज्य में दोबारा से परचम लहरा सकती है। वरना केंद्र के सत्ता विरोधी रुझान का असर टीडीपी के मंसूबों पर पानी फेर सकते हैं।