महाराष्ट्र के नासिक स्थित टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) के बीपीओ परिसर में धर्मांतरण रैकेट का मामला में एक याचिका दायर की गई है। इसमें कहा है कि ऐसे कृत्य आतंकवादी कृत्य की श्रेणी में आते हैं। इस याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को अवैध धर्मांतरण पर अंकुश लगाने के लिए कड़े कदम उठाने का निर्देश देने की मांग की गई है।
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जबरन धर्मांतरण अभियान का हिस्सा
धर्मांतरण से संबंधित एक स्वत संज्ञान मामले में दायर याचिका में तर्क दिया गया है कि टीसीएस नासिक मामला कोई अलग-थलग घटना नहीं है, बल्कि एक बड़े, संगठित और जबरन धर्मांतरण अभियान का हिस्सा है। याचिकाकर्ता के वकील ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि ‘धोखाधड़ी और जबरन धर्मांतरण’ देश की एकता और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है। याचिका में तर्क दिया गया है कि जब धर्मांतरण को जबरदस्ती या प्रलोभन का उपयोग करके एक संरचित नेटवर्क के माध्यम से अंजाम दिया जाता है, तो यह एक व्यवस्थित साजिश के बराबर होता है, जिसे अक्सर भारत के जनसांख्यिकीय संतुलन को बदलने के लिए विदेशी संस्थाओं की ओर से वित्त पोषित किया जाता है।
आतंकवाद से संबंधित कानूनों के तहत इन पर कार्रवाई
याचिका में कहा गया है कि इस तरह की गतिविधियां देश की अखंडता को खतरे में डालती हैं। इसलिए आतंकवाद से संबंधित कानूनों के तहत इन पर कार्रवाई की जानी चाहिए। संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए, याचिका इस बात पर जोर देती है कि धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार निरपेक्ष नहीं है। यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। याचिकाकर्ता ने केंद्र और राज्यों से अवैध धर्मांतरण पर अंकुश लगाने के लिए कड़े कदम उठाने के निर्देश देने की मांग की है। उसने न्यायालय से धर्मांतरण से संबंधित मामलों से निपटने के लिए विशेष न्यायालयों की स्थापना अनिवार्य करने का भी आग्रह किया है, ताकि त्वरित जांच और सुनवाई सुनिश्चित हो सके।
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टीसीएस नासिक जांच के दायरे में क्यों है?
दरअसल, आईटी क्षेत्र की दिग्गज कंपनी के नासिक स्थित केंद्र पर कर्मचारियों द्वारा शोषण, मानसिक उत्पीड़न और धार्मिक दबाव के आरोपों से जुड़े एक बड़े घोटाले के बाद गहन जांच पड़ताल शुरू हो गई है, जिसके चलते एक विशेष जांच दल (एसआईटी) ने जांच का गठन किया है। इस में कम से कम नौ महिला कर्मचारियों ने आगे आकर कार्यस्थल पर दुर्व्यवहार के एक निरंतर सिलसिले का आरोप लगाया है, जो 2022 से चला आ रहा है। उनकी शिकायतों में अनुचित स्पर्श, अश्लील टिप्पणियां, पीछा करना, दखलंदाजी भरी पूछताछ और कई आरोपियों द्वारा बार-बार अवांछित उत्पीड़न की घटनाओं का विवरण दिया गया है। कुछ एफआईआर में वरिष्ठ अधिकारियों की निष्क्रियता की ओर भी इशारा किया गया है, जिसके कारण कथित तौर पर दुर्व्यवहार को बढ़ावा मिला।