पूर्वोत्तर की सीमाओं पर आज हवा में श्रद्धा और गर्व घुला हुआ था। 1962 के भारत-चीन युद्ध के अमर योद्धा और परमवीर चक्र विजेता हवलदार जोगिंदर सिंह की वीरता को सलाम करते हुए तवांग के बुमला दर्रे पर 'शहीद दिवस' मनाया गया।
23 अक्तूबर 1962 ठंडी हवाओं के बीच बुमला दर्रे की बर्फीली ढलानों पर सिख रेजिमेंट के एक छोटे से दस्ते का नेतृत्व कर रहे थे हवलदार जोगिंदर सिंह। दुश्मन संख्या में कई गुना अधिक था, फिर भी उन्होंने मोर्चा संभाले रखा। जांघ में गोली लगने के बावजूद उन्होंने पीछे हटने से इनकार किया। जब गोलियां खत्म हो गईं, तो उन्होंने अपने सैनिकों के साथ बेयॉनेट चार्ज करते हुए चीनी सेना का मुकाबला किया। अंत तक वीरता से लड़े और शहादत को गले लगाया।
आज उसी बर्फीली ऊंचाई पर उनके नाम पर आयोजित श्रद्धांजलि समारोह में स्थानीय नागरिकों, सैनिकों और युवाओं की भीड़ उमड़ पड़ी। इस अवसर पर तवांग
के विधायक नमग्य त्सेरिंग के नेतृत्व में एक विशेष बाइक रैली निकाली गई, जो तवांग से बुमला तक लगभग 15,200 फीट की ऊंचाई तक पहुंची। हर मोड़ पर तिरंगा लहराता रहा, और हर चेहरे पर एक ही संदेश लिखा था, “देशभक्ति कभी ठंडी नहीं पड़ती।
यह आयोजन ऐसे समय पर हुआ है, जब तवांग, तवांग इंटरनेशनल मैराथन 2025 के उत्साह में भी डूबा हुआ है। देश-विदेश से आए हजारों धावक ‘रन अबव द
शहीद दिवस और अंतरराष्ट्रीय मैराथन का यह संगम तवांग के उस संदेश को और मजबूत करता है कि जहां वीरों की आत्मा बसती है, वहां हर सांस देशभक्ति से
महकती है। आज बुमला की ठंडी हवाओं में सिर्फ ठंडक नहीं, बल्कि उन सैनिकों की गर्मी है, जिनके साहस ने आज़ाद भारत की सीमाओं को सुरक्षित रखा।