तमिलनाडु जिसने राज्यभर में हिंदी लागू करने का विरोध किया था वहां हिंदी बोलने वालों की संख्या में 2001 से 2011 के बीच 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। यह आंकड़ा लेटेस्ट जनगणना का है। हालांकि इस अवधि के दौरान हिंदी बोलने वाले दक्षिण भारतीयों की संख्या में केवल 13 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। 1960 के दशक में हिंदी विरोधी प्रदर्शन हुआ था जिसके कारण तमिल की बहुत सी पीढ़ियां इस भाषा को सीखने से वंचित रह गईं।
चीजें तब बदलीं जब भारत के उत्तर, उत्तर-पूर्वी और उत्तर-पश्चिमी राज्यों में मजदूरों और अधिकारियों की नौकरी के लिए लोगों का यहां प्रवास होना शुरू हुआ। हिंदी बोलने वाले तमिलों की पूरी संख्या बहुत कम है। अंतरराष्ट्रीय जनसंख्या विशेषज्ञ पी अरोकियासामी ने कहा, 'लेकिन सीबीएसई और आईसीएसई की हालिया प्राथमिकता के कारण ज्यादातर बच्चे अपनी दूसरी और तीसरी भाषा के तौर पर
हिंदी को चुन रहे हैं। जो लोग तमिलनाडु के बाहर नौकरी तलाश रहे हैं वह भी हिंदी सीख रहे हैं।'
समाजशास्त्री जीएस करांत ने कहा,
तमिलों के लिए हिंदी सीखने के बहुत से कारण हैं। जिसमें प्रवास पहला है लेकिन टीवी कार्यक्रमों का भी प्रभाव पड़ता है, जिसके कारण तमिल लोग हिंदी के कुछ शब्द बोलना चाहते हैं। यह बदलाव तब शुरू हुआ जब रामायण और महाभारत का दूरदर्शन पर प्रसारण हुआ था। सभी तमिल हिंदी में बातचीत नहीं कर पाते हैं। वह तमिल, हिंदी और अंग्रेजी के जरिए उस संदेश बताने की कोशिश करते हैं जो वह चाहते हैं।
करांत ने आगे कहा, 'यदि एक ऑटोवाला जो अच्छी तरह से हिंदी नहीं जानता है लेकिन अपने यात्री को टूटी-फूटी हिंदी में सफर का किराया, रूट आदि बता दें तो उसका काम हो जाता है। इसका मतलब यह हुआ कि परिस्थिति बदलने के बावजूद शख्स अपनी रोजी-रोटी को कायम रख सकता है।