वेदांतम ने कहा कि तमिल राजनीति के पूर्व मुख्यमंत्रियों करुणानिधि और जयललिता के नहीं होने से आगामी विधानसभा चुनाव काफी महत्वपूर्ण हो गए हैं। ऐसे में इन चुनावों में यह तय होगा कि राज्य आध्यात्मिक दिशा में आगे बढ़ेगा या गैर-आध्यात्मिक दिशा में। उन्होंने कहा कि जब एमजीआर द्रविड़ मुनेत्र कड़गम यानी डीएमके से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई तो उन्होंने खुलकर आध्यात्मिक राजनीति की। वह मूकाम्बिका मंदिर जाते थे और बढ़-चढ़कर पूजा-अर्चना में हिस्सा लेते थे।
इसी तरह जयललिता ने अपनी आध्यात्मिकता को जारी रखा, लेकिन उन्होंने इसे सार्वजनिक नहीं किया। हालांकि, रजनीकांत भी खुलेआम इसे आध्यात्मिक राजनीति करार दे चुके हैं। उन्होंने लोगों पर स्थायी छाप छोड़ी है, जिससे आध्यात्मिक राजनीति की आवश्यकता बढ़ गई है। यही वजह है कि इस चुनाव में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है।
वीएचपी नेता ने कहा कि यह रजनीकांत पर निर्भर करता है कि वह भ्रष्ट अराजक शासन का रास्ता चुनते हैं या आध्यात्मिक मूल्यों को बनाए रखने वाली राजनीति का चुनाव करते हैं। वेदांतम ने कहा कि तमिलनाडु के लोगों को रजनीकांत से काफी उम्मीदें हैं। वह अपने स्वास्थ्य कारणों से राजनीति में आने में असमर्थ हैं, लेकिन जनता को वे मुद्दे आज भी याद हैं, जो उन्होंने उठाए थे। ऐसे में रजनीकांत को अपनी भूमिका समझते हुए आध्यात्मिक राजनीति का समर्थन करना चाहिए।