दक्षिण भारतीय राज्यों में सोने के प्रति कितना लगाव है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि पूरे देश के हॉलमार्क सेंटर में से एक तिहाई यहीं हैं। सोने के जेवर रखना राज्य की संस्कृति का हिस्सा है। जरूरत पड़ने पर लोग इसे गिरवी रख गोल्ड लोन ले लेते हैं। इसलिए यहां गोल्ड लोन माफी काफी लोगों पर असर डालने वाली स्कीम है और इसी के सहारे यहां के मतदाताओं को लुभाने की कोशिश भी होती है। दरअसल, तमिलनाडु में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले यहां का चुनावी मुद्दा किसान लोन से ज्यादा गोल्ड लोन बन चुका है।
चुनाव का एलान से ठीक पहले सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक (AIADMK) की 48 ग्राम तक के गोल्ड लोन माफी की घोषणा का असर चुनावी मैदान में भी दिख रहा है। तमिलनाडु में सहकारी संस्थाओं द्वारा बांटे गए 20 हजार करोड़ ऋण का करीब 40 फीसदी हिस्सा इसी गोल्ड लोन का है। राज्य में गोल्ड लोन कितने बड़े पैमाने पर लिए जाते हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सहकारी संस्थाओं द्वारा बांटे गए 20 हजार करोड़ के लोन में से लगभग 7000 करोड़ गोल्ड लोन के हैं।
गोल्ड-लोन माफी का फायदा महिला सेल्फ हेल्प ग्रुप की लगभग 15.5 लाख सदस्यों को मिल सकेगा। अन्नाद्रमुक की इस घोषणा से महिलाओं के एक बड़े वोट बैंक को रिझाने की कोशिश की जारी रही है। वहीं, जानकार गोल्ड लोन माफी के लिए किए गए 5400 करोड़ के बजट प्रावधान को चुनावी रिश्वत बता रहे हैं। बता दें कि तमिलनाडु में 40 से ज्यादा कोऑपरेटिव बैंक 4000 से ज्यादा प्राथमिक सहकारी संस्थाओं के नेटवर्क के जरिए सोना गिरवी रख उसके बदले लोन देते हैं। दूसरी ओर डीएमके (DMK)के रणनीतिकार प्रशांत किशोर गोल्ड माफी की घोषणा का काट ढूंढ रहे हैं।