पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने चुनाव आयोग के हालिया फैसलों पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि आयोग की ओर से जारी प्रेस नोट ही उसके खिलाफ जाता दिख रहा है। कुरैशी ने खास तौर पर बैठकों के एजेंडे, कार्यवाही का विवरण और मामलों की सुनवाई को लेकर आयोग की नई व्यवस्था पर सवाल खड़े किए।
‘प्रेस नोट में पुरानी गलतियों की बात मान ली’
एसवाई कुरैशी ने कहा कि चुनाव आयोग के प्रेस नोट में कई ऐसी बातें कही गई हैं, जिनसे यह संकेत मिलता है कि पहले इनका पालन नहीं हो रहा था। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर अब आयोग कह रहा है कि बैठकों का एजेंडा पहले जारी किया जाएगा, कार्यवाही का विवरण दिया जाएगा और मामलों की सुनवाई होगी, तो क्या पहले ऐसा नहीं होता था? उन्होंने इसे लेकर सवाल किया कि आखिर इस तरह की व्यवस्था की जरूरत क्यों पड़ी। कुरैशी ने कहा कि आयोग का यह बयान खुद उसके पुराने कामकाज पर सवाल खड़े करता है।
‘क्या भारत में दो तरह के कानून हो सकते हैं?’
कुरैशी ने फॉर्म- 6 को लेकर भी गंभीर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि अगर एक व्यक्ति के लिए फॉर्म- 6 का एक तरीका लागू होगा और दूसरे के लिए अलग तरीका अपनाया जाएगा, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भारत में दो तरह के कानून हो सकते हैं। यह सवाल उस विवाद के बीच आया है, जिसमें एसआईआर के दौरान फॉर्म- 6 में अतिरिक्त घोषणा जोड़े जाने को लेकर चुनाव आयोग के दो आयुक्तों ने आपत्ति दर्ज कराई थी। रिपोर्टों के मुताबिक, एसआईआर से जुड़े इस बदलाव को लेकर आयुक्तों ने इसकी वैधता पर सवाल उठाए थे।
फॉर्म-6 पर आयोग ने क्या कहा?
चुनाव आयोग ने 26 सितंबर के अपने फैसलों में कहा कि एसआईआर के लिए फॉर्म- 6 के साथ लगाई गई घोषणा को सुप्रीम कोर्ट बरकरार रख चुका है। आयोग के मुताबिक, गैर-एसआईआर अवधि में मतदाता पंजीकरण के लिए चुनाव नियमों के तहत लागू फॉर्म इस्तेमाल किए जाएंगे। यानी आयोग का कहना है कि एसआईआर के दौरान इस्तेमाल होने वाली व्यवस्था और सामान्य अवधि की व्यवस्था अलग हो सकती है। इसी अंतर को लेकर कुरैशी ने अपने बयान में सवाल उठाया है।
आयोग ने बैठकों को लेकर क्या बदला?
26 सितंबर को हुई पूर्ण आयोग की बैठक के बाद चुनाव आयोग ने कहा कि आगे सभी बैठकों का एजेंडा पहले साझा किया जाएगा और बैठकों की कार्यवाही का विवरण जारी किया जाएगा। आयोग ने यह भी कहा कि आयुक्तों की ओर से अधिकारियों को दिए गए निर्देशों का पूरी तरह पालन किया जाएगा।
आयोग ने इसके साथ एसआईआर में नोटिस पाने वाले कुछ मतदाताओं के लिए प्रक्रिया आसान करने का भी फैसला किया। ऐसे मामलों में बूथ स्तर के अधिकारी घर-घर जाकर दस्तावेज ले सकेंगे। सामान्य स्थिति में मतदाता को सुनवाई के लिए चुनाव अधिकारी के कार्यालय जाने की जरूरत नहीं होगी।
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विवाद की शुरुआत कहां से हुई?
पिछले दिनों चुनाव आयोग के दो आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से कई फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्ति दर्ज किए जाने की खबर सामने आई थी। रिपोर्टों के अनुसार, दोनों ने अलग-अलग मौकों पर एसआईआर, फॉर्म-6, मतदाता सूची के आंकड़ों और आयोग की तकनीकी व्यवस्था से जुड़े मुद्दे उठाए थे। इसके बाद चुनाव आयोग ने कहा कि एसआईआर से जुड़े उसके फैसले पूर्ण आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग ने यह भी कहा कि मतभेद और टिप्पणियां संस्थागत विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं।
कुरैशी ने किस बात पर सबसे बड़ा सवाल उठाया?
कुरैशी के बयान का मुख्य सवाल यही है कि अगर चुनाव आयोग अब बैठकों का एजेंडा पहले देने, कार्यवाही का विवरण जारी करने और मामलों की सुनवाई सुनिश्चित करने की बात कर रहा है, तो क्या पहले ये प्रक्रियाएं नियमित रूप से नहीं होती थीं। उन्होंने इन बदलावों को पुराने कामकाज के संदर्भ में सवालों से जोड़ते हुए कहा कि आयोग का अपना प्रेस नोट ही उसके खिलाफ जाता दिख रहा है। वहीं फॉर्म-6 को लेकर उन्होंने समान कानून और समान प्रक्रिया लागू होने का सवाल उठाया है।