आयुध कारखानों के निगमीकरण के बाद 3 वर्षों के भीतर 10000 से अधिक उच्च कुशल कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं। उनकी जगह पर स्थायी भर्ती न कर संविधा के आधार पर कर्मचारी रखे जा रहे हैं। नतीजा, आयुध कारखानों को पर्याप्त संख्या में अनुभवी कर्मचारी नहीं मिल पा रहे हैं। इन कारखानों का निगमीकरण, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ठीक नहीं है, इस बाबत पिछले सप्ताह 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा है। इसमें आग्रह किया गया है कि 41 आयुध कारखानों के निगमीकरण को रद्द कर उन्हें दोबारा से आयुध निर्माणी बोर्ड के तहत संचालित किया जाए। राष्ट्र हित में यह कदम बेहद जरुरी है।
प्रधानमंत्री मोदी को लिखे पत्र पर आईएनटीयूसी, एआईटीयूसी, एचएमएस, सीआईटीयू, एआईयूटीयूसी, टीयूसीसी, एसईडब्लूए, एआईसीसीटीयू, एलपीएफ और यूटीयूसी, केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के पदाधिकारियों के हस्ताक्षर हैं। पत्र के मुताबिक, संयुक्त मंच ने भारत के स्वदेशी रक्षा उत्पादन पारिस्थितिकी तंत्र को दोबारा से रक्षा मंत्रालय के तहत आयुध कारखानों के स्वरूप में खड़ा करने की बात कही है। आयुध कारखानों का निगमीकरण, सरकार को अपनी इस नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। हमारे आयुध कारखानों की विरासत का, जो दो शताब्दियों से अधिक पुरानी है, महत्वपूर्ण रक्षा आवश्यकताएं पूरी करने और भारत को आत्मनिर्भरता के स्तर तक पहुंचाने में उल्लेखनीय योगदान है। आज के जटिल रणनीतिक माहौल को देखते हुए, आयुध कारखानों की पारंपरिक संरचना, विशेषज्ञता और स्थापित ढांचे को संरक्षित करना, यह रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए 41 आयुध कारखानों की स्थिति को 30 सितंबर, 2021 से पहले के आयुध निर्माणी बोर्ड के तहत सरकारी संगठन, इसे बहाल करना आवश्यक है।
भारत अपनी रक्षा उत्पादन क्षमताओं को मजबूत करने के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। आयुध कारखानों ने ऐतिहासिक रूप से भारत के सशस्त्र बलों को उनकी परिचालन आवश्यकताओं के लिए विश्वसनीय एवं अनुकूलित समाधान प्रदान किए हैं। विशेष रूप से तोपखाने, छोटे हथियार, गोला-बारूद, बुलेट प्रूफ जैकेट, बैलिस्टिक हेलमेट और अन्य आवश्यक उपकरणों सहित सभी प्रकार के ट्रूप कम्फर्ट आइटम तैयार करने में आयुध कारखानों की गहरी विशेषज्ञता रही है। इन कारखानों ने भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा में पारंपरिक मेट्रिक्स से परे हटकर योगदान दिया है।
सरकार का यह कथन, कि आयुध कारखानों के निगमीकरण से कार्यकुशलता बढ़ेगी और जवाबदेही आएगी, विफल हो गया है। आज 50% से अधिक आयुध कारखानों में कोई पूरा कार्यभार नहीं है, क्योंकि सशस्त्र बल, निजी क्षेत्रों की ओर सप्लाई ऑर्डर बढ़ा रहे हैं। केंद्र सरकार ने आयुध कारखानों को सात कंपनियों में विभाजित करने के लिए केपीएमजी सलाहकार की सिफारिशों को लागू किया था। अब इन सात कंपनियों को 4 में विभाजित करने के लिए एसबीआई कैप सलाहकार को नियुक्त किया गया है।
भारतीय आयुध कारखानों ने संघर्ष के समय में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसमें 1962 का भारत-चीन टकराव, 1965, 1971 का भारत-पाक युद्ध और 1999 का कारगिल संघर्ष शामिल है। हमारे सशस्त्र बलों की परिचालन संबंधी जरूरतों को तेजी से पूरा करने में आयुध कारखानें, भारत की रक्षा तैयारियों की रीढ़ के रूप में खड़े रहे हैं। भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरियों से चिह्नित वर्तमान वैश्विक परिदृश्य को देखते हुए, रक्षा मंत्रालय के तहत इन कारखानों के निगमीकरण पर पुनर्विचार करना आवश्यक है। उनकी संरचना और मिशन-उन्मुख फोकस को संरक्षित करने से भारत की आत्मनिर्भरता को ज्यादा मजबूत किया जा सकता है।
इससे देश की सुरक्षा अनिवार्यताओं के साथ उभरते खतरों का प्रभावी ढंग से जवाब देने में मदद मिलेगी। इस बाबत कई चिंताएं विचारणीय हैं। सबसे पहले, आयुध कारखानों का कॉर्पोरेट संस्थाओं में परिवर्तन, इससे देश की सुरक्षात्मक प्राथमिकता, लाभप्रदता और प्रतिस्पर्धात्मकता की ओर स्थानांतरित हो सकती है। निगमीकरण के चलते, राष्ट्रीय सुरक्षा की राह में सशस्त्र बलों के लिए आपूर्ति लचीलापन सुनिश्चित करना, इस प्राथमिक उद्देश्य के साथ टकराव हो सकता है।
केंद्रीय ट्रेड यूनियनों का कहना है, वाणिज्यिक उद्यमों के विपरीत, आयुध कारखानों का दायित्व, हमेशा सशस्त्र बलों की अनूठी, जरूरी और कभी-कभी अप्रत्याशित मांगों को पूरा करना रहा है। यह एक ऐसा सुरक्षा चक्र रहा है, जिसका निगमीकरण के तहत समझौता किया जा सकता है। वजह, निगम अत्यधिक कुशल श्रमिकों को कारगिल संकट जैसे 'युद्ध' से निपटने के रूप में नहीं रखेंगे। इसके अलावा आपातकालीन स्थिति, जैसे कोविड-19 महामारी के दौरान 50% से अधिक आयुध कारखानों ने लॉकडाउन अवधि में देश की स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली की विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए दिन-रात काम किया था। यह सब तभी संभव है, जब आयुध कारखाने एक सरकारी संगठन के रूप में सीधे सरकार के नियंत्रण में रहें।
इसके अलावा, मौजूदा संरचना ने पारंपरिक रूप से सशस्त्र बलों के साथ घनिष्ठ, उत्तरदायी संबंध को सक्षम किया है। इससे वास्तविक समय की जरूरतों के आधार पर तेजी से समायोजन और अनुकूलित उत्पादन की अनुमति मिलती है। आयुध कारखानों के निगमीकरण से नई बाधाएँ पैदा हो रही हैं। इसके चलते, तात्कालिक परिस्थितियों में वह जवाबदेही और चपलता प्रभावित होती है, जिस पर हमारा रक्षा क्षेत्र गंभीर रूप से निर्भर करता है। निगमीकरण से इन कारखानों के भीतर अनुभवी कार्यबल की रोजगार सुरक्षा और कल्याण भी खतरे में पड़ रहा है। आयुध कारखानों का यह कार्यबल, देश की रक्षा के लिए समर्पित विशेषज्ञ और देशभक्त, दोनों ही हैं।
आयुध कारखानों के निगमीकरण के बाद 3 वर्षों के भीतर 10000 से अधिक उच्च कुशल कर्मचारी सेवानिवृत्त हो गए हैं। उनका कोई प्रतिस्थापन नहीं हुआ है। जनशक्ति की कमी को निगम द्वारा निश्चित अवधि के रोजगार व संविदात्मक नियुक्तियों आदि के माध्यम से पूरा किया जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप अधिक दुर्घटनाएं हो रही हैं। कर्मचारी हताहत होते हैं और उत्पादों की गुणवत्ता से भी समझौता होता है। भारत ने 'मेक इन इंडिया' और आत्मनिर्भर भारत मिशन, के तहत सराहनीय लक्ष्य निर्धारित किए हैं। खासकर सार्वजनिक रक्षा क्षेत्र में इन महत्वाकांक्षाओं को साकार करने के लिए अनुसंधान एवं विकास में निरंतर निवेश की आवश्यकता है। हमारी आयुध फैक्ट्रियों को मजबूत कर और उनके मौजूदा ढांचे के भीतर उनकी क्षमताओं को बढ़ाकर, हम तोपखाने, बख्तरबंद वाहनों और परिष्कृत हथियारों जैसे क्षेत्रों में पर्याप्त लाभ हासिल कर सकते हैं।
महत्वपूर्ण उपकरणों के स्वदेशी उत्पादन के विस्तार पर नए सिरे से केंद्रित नीति न केवल आयात पर हमारी निर्भरता को कम करेगी, बल्कि हमें रक्षा उपकरणों की बढ़ती वैश्विक मांग को पूरा करने, निर्यात के अवसर पैदा करने और रक्षा विनिर्माण नेता के रूप में भारत की स्थिति को और मजबूत करने में भी सक्षम बनाएगी। रक्षा मंत्रालय ने निगमीकरण से पहले आयुध कारखानों के रक्षा नागरिक कर्मचारियों के इस मजबूत प्रस्ताव को नजरअंदाज कर दिया था। केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने इस संबंध में कहा है, हम ईमानदारी से रणनीतिक स्वायत्तता, जवाबदेही और परिचालन तत्परता को बनाए रखने के लिए निगमीकरण नीति के पुनर्मूल्यांकन का आग्रह करते हैं। हमारे आयुध कारखानों ने हमेशा उक्त नीतियों का समर्थन किया है।
यह सुनिश्चित करते हुए कि भारत का रक्षा क्षेत्र लचीला, उत्तरदायी और हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा अनिवार्यताओं पर केंद्रित है, मूल मिशन-उन्मुख 2 ढांचे के भीतर आयुध कारखानों को मजबूत करने और आधुनिकीकरण करने से, देश को सच्ची आत्मनिर्भरता हासिल करने में मदद मिल सकती है। आयुध कारखानों के निगमीकरण के बाद कर्मचारी पूरी तरह से हतोत्साहित हैं। उनकी सेवा संबंधी सभी मुद्दे अनसुलझे हैं। रक्षा मंत्रालय उनकी वास्तविक शिकायतों के निवारण के लिए कोई कदम नहीं उठा रहा है। ट्रेड यूनियनों ने पीएम मोदी से अनुरोध किया है कि पिछले 3 वर्षों की अवधि के दौरान आयुध कारखानों के संपूर्ण प्रदर्शन, वित्तीय लेनदेन, इन 7 आयुध निर्माणी निगमों द्वारा लिए गए नीतिगत निर्णयों की ऑडिट के लिए एक स्वतंत्र जांच का आदेश दिया जाए।