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Bombay High Court: 'पत्नी के चरित्र पर शक बच्चे का डीएनए टेस्ट कराने का आधार नहीं', हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

Wed, 09 Jul 2025 04:03 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई

सार

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि व्यक्ति ने अपनी तलाक याचिका में अपनी पत्नी के चरित्र पर संदेह जताया, लेकिन उसने कभी यह दावा नहीं किया कि वह बच्चे का पिता नहीं है।
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बॉम्बे उच्च न्यायालय - फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
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बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने कहा है कि सिर्फ इसलिए कि किसी व्यक्ति को अपनी पत्नी के चरित्र पर संदेह है, उसके नाबालिग बच्चे का पितृत्व निर्धारित करने के लिए डीएनए परीक्षण कराने का आधार नहीं बनता। एक पारिवारिक कोर्ट की ओर से नाबालिग लड़के का डीएनए परीक्षण कराने के आदेश को रद्द करते हुए न्यायमूर्ति आरएम जोशी ने कहा कि ऐसी आनुवंशिक जांच केवल असाधारण मामलों में ही कराई जा सकती है।

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1 जुलाई के आदेश में न्यायमूर्ति जोशी ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि कोई व्यक्ति व्यभिचार के आधार पर तलाक का हकदार होने का दावा करता है या चरित्र पर शक होने को अपना आधार मानता है तो डीएनए परीक्षण कराने का आदेश देने का कोई उचित मामला नहीं बनता। कोर्ट के आदेश की प्रति बुधवार को उपलब्ध कराई गई।

क्या यह डीएनए परीक्षण का आदेश देने का उचित मामला?
हाईकोर्ट ने कहा, 'एक प्रश्न उठता है कि क्या यह डीएनए परीक्षण का आदेश देने का उचित मामला है। इसका स्पष्ट उत्तर नहीं होगा। कोर्ट ने कहा कि अगर पत्नी के चरित्र पर सवाल है तो बच्चे का पितृत्व परीक्षण कराने के बजाय इसे किसी अन्य साक्ष्य से साबित किया जा सकता है। यह आदेश एक व्यक्ति की अलग रह रही पत्नी और उसके 12 वर्षीय बेटे की ओर से दायर याचिका पर सुनाया गया। याचिका में एक पारिवारिक अदालत की ओर से फरवरी 2020 में पारित आदेश को चुनौती दी गई थी। आदेश में बच्चे को पितृत्व का फैसला करने के लिए डीएनए प्रोफाइलिंग परीक्षण कराने का निर्देश दिया गया था।
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'पारिवारिक अदालत ने ऐसा आदेश पारित करके गलती की'
हाईकोर्ट ने कहा कि पारिवारिक अदालत ने ऐसा आदेश पारित करके गलती की। इसके बाद कोर्ट ने उसे रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति जोशी ने आदेश में कहा कि पारिवारिक अदालत के लिए बच्चे के सर्वोत्तम हित पर विचार करना अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि किसी को भी खासकर नाबालिग बच्चे को रक्त परीक्षण कराने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब वह परीक्षण के लिए सहमत होने या न करने का निर्णय लेने में भी सक्षम न हो।

'अदालतों को नाबालिग बच्चे के अधिकारों का संरक्षक बनना चाहिए'
उच्च न्यायालय ने कहा कि जब किसी बच्चे के माता-पिता आपस में लड़ रहे हों और ज्यादातर समय बच्चा इस लड़ाई में एक हथियार बन जाता है तो अदालतों को नाबालिग बच्चे के अधिकारों का संरक्षक बनना चाहिए। कोर्ट ने कहा, 'न्यायालय पर पक्षों के बीच विवादित मुद्दों पर निर्णय लेने से कहीं अधिक जिम्मेदारी होगी। ऐसे में बिना किसी शक के अदालत को नाबालिग बच्चे का रक्त या डीएनए परीक्षण कराने का आदेश देने से पहले उसके पक्ष-विपक्ष पर विचार करना चाहिए।'

बच्चे का डीएनए परीक्षण कराने की मांग की थी
व्यक्ति ने चरित्र पर संदेह का आरोप लगाते हुए अपनी पत्नी से तलाक मांगा था। याचिका के मुताबिक, इस जोड़े की शादी 2011 में हुई थी और जनवरी 2013 में जब वे अलग हुए तब महिला तीन महीने की गर्भवती थी। उस व्यक्ति ने अपनी अलग रह रही पत्नी के चरित्र पर शक को सही साबित करने के लिए बच्चे का डीएनए परीक्षण कराने की मांग की थी।

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