Chaudhary Devilal and Sushma Swaraj
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बात 1977 की है जब राजनीति के धुरंधर रहे कद्दावर जाट नेता चौधरी देवीलाल हरियाणा के मुख्यमंत्री बने थे। उन्होंने विधानसभा की 90 में से 85 सीटें जीतकर जनता पार्टी की झोली में डाल दी थीं। जिसके बाद पार्टी में उनका कद इतना ऊंचा हो गया था कि कोई उनके सामने बोलने की हिम्मत नहीं कर सकता था। वहीं उनके मंत्रिमंडल में 25 वर्षीय सुषमा स्वराज सबसे युवा कैबिनेट मंत्री भी थीं, जिन्हें सामाजिक कल्याण, श्रम और रोजगार जैसे आठ विभागों की जिम्मेदारी दी गई।
मधु लिमये और रवि राय ने कराया था बीच बचाव
लेकिन किसी मुद्दे पर पर ताऊ देवीलाल ने सुषमा स्वराज के लिए कठोर शब्दों का इस्तेमाल कर दिया। एक युवा आदर्शवादी सोच से लबरेज उनकी युवा कैबिनेट सहयोगी सुषमा ने तुरंत मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। हालांकि इससे पहले रेडियो पर उन्हें अपनी बर्खास्तगी की सूचना मिल चुकी थी। मामला इतना बढ़ गया था कि युवा नेत्री सुषमा स्वराज ने इस्तीफा देने के बाद देवीलाल को तानाशाह तक कह डाला था। बाद में जनता पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष चंद्रशेखर और पार्टी के महासचिव मधु लिमये और रवि राय की मध्यस्थता के बाद मामला सुलझ गया। सुषमा फिर से मंत्री बन गईं।
मजदूरों के साथ थीं सुषमा
हरियाणा सरकार ने फरीदाबाद औद्योगिक क्षेत्र में धारा-144 लागू कर दी। वहां पर श्रमिकों और फैक्ट्री मालिकों के बीच विवाद चल रहा था। सुषमा स्वराज के पास श्रम, रोजगार और आवास का भी मकहमा था, उन्होंने इस धारा का पुरजोर विरोध किया। वे मजदूरों को उनके अधिकार देने का समर्थन कर रहीं थीं। मुख्यमंत्री देवीलाल ने इसे सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत का उल्लंघन मानते हुए सुषमा के विभागों में कटौती कर दी। लेकिन धीरे-धीरे जब यह बात सार्वजनिक होने लगी तो सुषमा ने मंत्रालय से इस्तीफे का एलान कर दिया।
देवीलाल ने कहा था अनुभवहीन और अति उत्साही
जब एक साक्षात्कार में सुषमा से पूछा गया कि उन्हें मंत्रिमंडल से बर्खास्तगी की सूचना कैसे मिली तो उनका जवाब था कि रेडियो से पता चला। सुषमा ने जनता पार्टी के संसदीय बोर्ड को भी सारे घटनाक्रम से अवगत करा दिया। यहां तक कि उन्होंने यह मुद्दा सड़क पर उठाने की धमकी भी दे डाली थी। मुख्यमंत्री ने इसे अपमान मानते हुए कहा कि वे अनुभवहीन और अति उत्साही महिला के साथ काम नहीं कर सकते। वहीं सुषमा का जवाब था कि पूर्व सीएम बंसीलाल की तुलना में देवीलाल बहुत बुरे तरीके से राज्य चला रहे हैं। जिसके बाद ट्रेड यूनियन और महिला संगठन सुषमा स्वराज के पक्ष में आवाज बुलंद करने लगे।
खुलकर साथ आए थे जार्ज फर्नांडीस
बात इतनी बढ़ चुकी थी कि मामला जनता पार्टी आलाकमान के पास पहुंच गया। उस वक्त चंद्रशेखर पार्टी अध्यक्ष थे। इस विवाद को सुलझाने के लिए 17 नवंबर से 21 नवंबर के बीच कई बैठकें हुईं। पार्टी हाईकमान कार्रवाई को लेकर पसोपेश में था, वहीं इस बीच जॉर्ज फर्नांडीस भी खुलकर सुषमा स्वराज के पक्ष में आ गए। जॉर्ज फर्नांडीस ने सुषमा का पुराना अहसान मानते हुए मजबूती से उनका पक्ष लिया। असल में सुषमा स्वराज ने बड़ौदा डायनामाइट मामले में फर्नांडीस का बचाव किया था। पार्टी अध्यक्ष चंद्रशेखर, महासचिव मधु लिमये, रवि राय और वरिष्ठ नेता जॉर्ज फर्नांडीस ने मध्यस्थता कर मामला सुलझा दिया। पार्टी की ओर से प्रचारित किया गया कि सुषमा स्वराज ने मुख्यमंत्री की आलोचना पर खेद व्यक्त किया है, साथ ही उन्हें इस मामले पर जनता के बीच चर्चा करने से बचने की सलाह भी दी गई।
सुषमा के खिलाफ थे उद्योगपति
सुषमा का कहना था कि फरीदाबाद और उसके आसपास मजदूरों की हालत बहुत खराब है। वे बुनियादी सुविधाओं से भी महरूम हैं। क्योंकि धारा 144 के चलते वे अपने अधिकारों की लड़ाई भी नहीं लड़ सकते हैं। सुषमा ने कहा था कि फरीदाबाद के उद्योगपति मेरे खिलाफ हैं और मेरे मंत्रिमंडल से मेरे निष्कासन की पैरवी में जुटे हैं। लेकिन जब वे फिर से मंत्रिमंडल में शामिल हुईं, तो उन्होंने कहा कि मैं खुश हूं और मुझे ऐसा लगता है कि मेरी बहाली जनता पार्टी में लोकतांत्रिक ताकतों की जीत है।