इस निर्णय के समर्थन के बावजूद मेरा मानना है कि इसकी घोषणा से पहले सरकार को व्यापक तैयारी करने की जरूरत थी। सरकार कालाधन को बाहर लाने के लिए दूसरा विकल्प आजमा सकती थी। सरकार 500 और 1000 रुपये के नोट को अवैध घोषित करने के बदले इन्हीं नोटों का रंग बदलने का भी निर्णय ले सकती थी। प्रधानमंत्री कहते कि सरकार ने इन नोटों का रंग बदलने का फैसला कर लिया है।
जिनके पास 500 और 1000 रुपये के नोट हैं वह इनके बदले नए रंग और डिजाइन किए नोट हासिल कर सकते हैं। मगर यह हुआ नहीं है। ऐसे में मुझे आशंका है कि सरकार केइस फैसले से देश भर में अफरातफरी मचेगी। क्योंकि 500 और 1000 रुपये की नोट की कीमत इतनी बड़ी नहीं है जिसकी पहुंच आम आदमी तक नहीं है। वह भी तब जब खुद सरकार ने न्यूनतम वेतन करीब 40000 रुपये प्रतिमाह कर दिया है।
जहां तक कालाधन की समस्या की बात है तो कोई भी इससे असहमत नहीं हो सकता कि भारत की यह सबसे बड़ी समस्या है। कालाधन गरीब को गरीब बनाए रखता है। आतंकवाद को नई ताकत देता है। फिर जाली नोट की समस्या भी बहुत बड़ी है।
अगर ईमानदारी से सरकार के इस निर्णय को अमलीजामा पहनाया गया तो निश्चित रूप से इसकेबेहतर परिणाम सामने आएंगे। मगर मैं फिर कहूंगा कि ऐसे में जब देश की पूरी व्यवस्था की भ्रष्ट और बुरी तरह सड़ गल गई है, तब क्या वाकई हम इस निर्णय का एक बेहतर परिणाम देख पाएंगे?
(हिमांशु मिश्र से बातचीत पर आधारित)