सुप्रीम कोर्ट ने ग्वालियर स्थित हजरत शेख मोहम्मद गौस की दरगाह पर उर्स और धार्मिक गतिविधियों की अनुमति से जुड़े मामले पर सुनवाई करने का निर्णय लिया है। यह मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें एएसआई द्वारा संरक्षित स्मारक घोषित किए जाने के बाद धार्मिक आयोजन की अनुमति देने से इनकार किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने ग्वालियर स्थित हजरत शेख मोहम्मद गौस की दरगाह पर उर्स और अन्य धार्मिक गतिविधियों की अनुमति को लेकर दाखिल याचिका पर सुनवाई करने का फैसला किया है। यह मामला उस आदेश से जुड़ा है जिसमें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने धार्मिक गतिविधियों पर रोक कायम रखी थी।
विज्ञापन
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने केंद्र और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया। कोर्ट ने इस याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने पहले यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि दरगाह को 1962 में पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) ने संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया था।
हाईकोर्ट का फैसला
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से अनुरोध किया था कि उन्हें उर्स और नज़्म जैसी धार्मिक गतिविधियों की अनुमति दी जाए। उनका दावा था कि वे हजरत शेख मोहम्मद गौस के वैधानिक उत्तराधिकारी हैं और पिछले 400 वर्षों से यहां धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन होते आए हैं। हालांकि, हाईकोर्ट ने साफ किया कि एएसआई ने इस स्थल को राष्ट्रीय महत्व का संरक्षित स्मारक घोषित किया है और इसे सुरक्षित रखना सरकार की जिम्मेदारी है।
एएसआई की दलीलें
केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील ने बताया कि मोहम्मद गौस का मकबरा राष्ट्रीय स्मारक के रूप में अधिसूचित है और इसे संरक्षित करना एएसआई की जिम्मेदारी है। अदालत ने माना कि यह स्थल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व का है, जहां संगीत सम्राट तानसेन की समाधि भी स्थित है। ऐसे में इस परंपरागत धरोहर को संरक्षित रखना बेहद जरूरी है।
याचिकाकर्ता का तर्क
याचिकाकर्ता ने कहा कि मार्च 2024 में उन्होंने एएसआई को उर्स की अनुमति के लिए आवेदन दिया था, जिसे खारिज कर दिया गया। उनका तर्क था कि दरगाह में लंबे समय तक धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन होते रहे हैं, लेकिन अब प्रशासन ने इन गतिविधियों को सीमित कर दिया है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि इस फैसले की समीक्षा की जाए और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को बहाल किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर विस्तृत सुनवाई के लिए सभी पक्षों से जवाब मांगा है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि न्यायालय एएसआई की ओर से स्मारक संरक्षण की जिम्मेदारी और धार्मिक गतिविधियों की अनुमति के बीच संतुलन कैसे बनाता है।