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अब सबरीमाला मंदिर में जा सकेंगी हर उम्र की महिलाएं, 'भक्ति में भेदभाव नहीं किया जा सकता'

Fri, 28 Sep 2018 02:20 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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Sabarimala temple
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केरल के सबरीमला स्थित अय्यप्पा मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश का रास्ता साफ हो गया है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ ने 4:1 के बहुमत के फैसले में कहा कि मंदिर में महिलाओं को प्रवेश से रोकना लैंगिक आधार पर भेदभाव है और यह प्रथा हिंदू महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन करती है। 
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सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने मामले में चार अलग-अलग फैसले लिखे। न्यायमूर्ति आर. एफ. नरीमन और न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ ने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति ए. एम. खानविलकर के फैसले से सहमति व्यक्त की जबकि न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा का फैसला बहुमत के विपरीत था। 

'भक्ति में भेदभाव नहीं किया जा सकता' 

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने फैसला सुनाते हुए कहा कि धर्म मूलत: जीवन शैली है जो जिंदगी को ईश्वर से मिलाती है। भक्ति में भेदभाव नहीं किया जा सकता है और पितृसत्तात्मक धारणा को आस्था में समानता के साथ खिलवाड़ करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। उन्होंने कहा कि भगवान अय्यप्पा को मानने वाले किसी दूसरे संप्रदाय या धर्म के नहीं हैं। 
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मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि 10 से 50 साल की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से प्रतिबंधित करने की प्रथा को आवश्यक धार्मिक परंपरा नहीं माना जा सकता और केरल का यह कानून महिलाओं को शारीरिक/जैविक प्रक्रिया के आधार पर उनके अधिकारों से वंचित करता है। 

इंदु मल्होत्रा का फैसला बहुमत के विपरीत 

संविधान पीठ में एक मात्र महिला न्यायाधीश जस्टिस इंदु मल्होत्रा का फैसला बाकी जजों के बहुमत के फैसले के विपरीत था। उन्होंने कहा कि देश में पंथनिरपेक्ष माहौल बनाये रखने के लिये गहराई तक धार्मिक आस्थाओं से जुड़े विषयों के साथ छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए। 

उनका मानना था कि 'सती' जैसी सामाजिक कुरीतियों से इतर यह तय करना अदालत का काम नहीं है कि कौन सी धार्मिक परंपराएं खत्म की जाएं। उन्होंने कहा कि भगवान अय्यप्पा के श्रद्धालुओं के पूजा करने के अधिकार के साथ समानता के अधिकार का टकराव हो रहा है। इस मामले में मुद्दा सिर्फ सबरीमाला तक सीमित नहीं है। इसका अन्य धर्म स्थलों पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। 
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न्यायमूर्ति आर. एफ. नरीमन का फैसला 

न्यायमूर्ति आर. एफ. नरीमन ने अपने फैसले में कहा कि 10-50 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं को प्रतिबंधित करने की सबरीमाला मंदिर की प्रथा का संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 समर्थन नहीं करते हैं। उन्होंने कहा कि महिलाओं को प्रवेश से रोकना अनुच्छेद 25 (प्रावधान 1) का उल्लंघन है और वह केरल हिंदू सार्वजनिक धर्मस्थल (प्रवेश अनुमति) नियम के प्रावधान 3(बी) को निरस्त करते हैं। 

जस्टिस चंद्रचूड़ ने फैसले में ये कहा

न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ ने कहा कि महिलाओं को पूजा करने के अधिकार से वंचित करके धर्म को ढाल की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है और यह मानवीय गरिमा के विरूद्ध है। उन्होंने कहा कि गैर-धार्मिक कारणों से महिलाओं को प्रतिबंधित किया गया है और यह सदियों से जारी भेदभाव का साया है। 

मंदिर के मुख्य पुजारी ने कहा- फैसले से निराश हूं

सबरीमाला मंदिर के मुख्य पुजारी कंडारारू राजीवारू ने कहा कि फैसले से निराश हूं, लेकिन महिलाओं के प्रवेश पर उच्चतम न्यायालय का निर्णय स्वीकार है। वहीं, त्रावणकोर देवस्वाम बोर्ड के अध्यक्ष ए. पद्मकुमार ने कहा कि हम अन्य धार्मिक प्रमुखों से समर्थन मिलने के बाद इस मामले को लेकर कोर्ट के पास एक समीक्षा याचिका लेकर जाएंगे। 

बता दें कि पीठ ने यह फैसला केरल के सबरीमला स्थित भगवान अय्यप्पा मंदिर में रजस्वला आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनाया। दरअसल, इससे पहले मंदिर में 10-50 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी थी, लेकिन अब हर उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति मिल गई है। 
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