फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

विवाहेतर संबंध अपराध से बाहर, पढ़िए पति-पत्नी और वो पर सुप्रीम कोर्ट के जजों ने क्या कुछ कहा

Thu, 27 Sep 2018 05:13 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
सांकेतिक चित्र
विज्ञापन

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एडल्टरी (व्यभिचार) को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया है। भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) दीपक मिश्रा की अगुवाई में पांच जजों की बेंच में शामिल जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस आरएफ नरीमन, डीवाई चंद्रचूड़ और एक मात्र महिला जज इंदु मल्होत्रा ने सर्वसम्मति से सेक्शन 497 को असंवैधानिक करार दिया। पढ़िए फैसला सुनाते वक्त किस जज ने क्या कहा। 

विज्ञापन


एडल्टरी लॉ पर सीजेआई दीपक मिश्रा ने ये कहा
एडल्टरी (व्यभिचार) लॉ पर फैसला सुनाते समय प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा कि आईपीसी की सेक्शन 497 महिला के सम्मान के खिलाफ है। महिलाओं को हमेशा समान अधिकार मिलना चाहिए, महिला को समाज की इच्छा के हिसाब से सोचने को नहीं कहा जा सकता।

संविधान की खूबसूरती यही है कि उसमें ‘मैं, मेरा और तुम’ सभी शामिल हैं।' सीजेआई दीपक मिश्रा ने कहा कि अडल्टरी तलाक का आधार हो सकता है, लेकिन यह अपराध नहीं होगा। 'एक लिंग के व्यक्ति को दूसरे लिंग के व्यक्ति पर कानूनी अधिकार देना गलत है। इसे शादी रद्द करने का आधार बनाया जा सकता है, लेकिन इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है।'
विज्ञापन


'आईपीसी की धारा 497 महिला के सम्मान के खिलाफ है। महिलाओं को हमेशा समान अधिकार मिलना चाहिए। महिला को समाज की इच्छा के हिसाब से सोचने को नहीं कहा जा सकता।' 'पति कभी भी पत्नी का मालिक नहीं हो सकता है। संसद ने भी महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा पर कानून बनाया हुआ है।'

चीन, जापान, ब्राजील में ये एडल्टरी अपराध नहीं

जस्टिस एएम खानविलकर ने कहा कि 'एडल्टरी किसी तरह का अपराध नहीं है, लेकिन अगर इस वजह से आपका पार्टनर खुदकुशी कर लेता है, तो फिर उसे खुदकुशी के लिए उकसाने का मामला माना जा सकता है।' चीन, जापान, ब्राजील में ये एडल्टरी अपराध नहीं है। ये पूरी तरह से निजता का मामला है। एडल्टरी 'अनहैपी मैरिज' का केस भी नहीं हो सकता, क्योंकि अगर इसे अपराध मानकर केस करेंगे, तो इसका मतलब दुखी लोगों को सजा देना होगा।'

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि 'एडल्टरी कानून मनमाना है। यह महिला की सेक्सुअल च्वॉइस को रोकता है और इसलिए असंवैधानिक है। महिला को शादी के बाद सेक्सुअल चॉइस से वंचित नहीं किया जा सकता है।'
 
जस्टिस रोहिंटन नरीमन ने कहा कि 'एडल्टरी संविधान के मूल अधिकारों का उल्लंघन है। आईपीसी 497 अपने आप में मनमानी है।'

जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने कहा कि कोई ऐसा कानून जो पत्नी को कमतर आंके, ऐसा भेदभाव संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। एक महिला को समाज की मर्जी के मुताबिक सोचने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। 

बता दें कि इससे पहले 8 अगस्त को हुई सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा था कि एडल्टरी अपराध है और इससे परिवार और विवाह तबाह होता है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुआई वाली संवैधानिक बेंच ने सुनवाई के बाद कहा था कि मामले में फैसला बाद में सुनाया जाएगा। 

 

व्यभिचार पर केरल के अनिवासी भारतीय ने दायर की थी याचिका?

केरल के एक अनिवासी भारतीय जोसेफ साइन ने इस संबंध में याचिका दाखिल करते हुए आईपीसी की धारा-497 की संवैधानिकता को चुनौती दी थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल दिसंबर में सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया था और जनवरी में इसे संविधान पीठ को भेजा गया था।

जानिए क्या था एडल्टरी (व्यभिचार) कानून?
158 साल पुरानी आईपीसी की धारा-497 के तहत अगर कोई शादीशुदा पुरुष किसी अन्य शादीशुदा महिला के साथ आपसी रजामंदी से शारीरिक संबंध बनाता है तो उक्त महिला का पति एडल्टरी (व्यभिचार) के नाम पर उस पुरुष के खिलाफ केस दर्ज करा सकता है। हालांकि, ऐसा व्यक्ति अपनी पत्नी के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकता है और न ही विवाहेतर संबंध में लिप्त पुरुष की पत्नी इस दूसरी महिला के खिलाफ कोई कार्रवाई कर सकती है।

इस धारा के तहत ये भी प्रावधान है कि विवाहेतर संबंध में लिप्त पुरुष के खिलाफ केवल उसकी साथी महिला का पति ही शिकायत दर्ज कर कार्रवाई करा सकता है। किसी दूसरे रिश्तेदार अथवा करीबी की शिकायत पर ऐसे पुरुष के खिलाफ कोई शिकायत नहीं स्वीकार होगी।

 
विज्ञापन

एडल्टरी (व्यभिचार) पर अब तक क्या था कानून?

धारा 497 केवल उस पुरुष को अपराधी मानती है, जिसके किसी और की पत्नी के साथ संबंध हैं। पत्नी को इसमें अपराधी नहीं माना जाता, जबकि पुरुष के लिए पांच साल की सजा का प्रावधान है। कोई पुरुष किसी विवाहित महिला के साथ उसकी सहमति से शारीरिक संबंध बनाता है, लेकिन उसके पति की सहमति नहीं लेता है, तो उसे पांच साल तक की जेल की सजा हो सकती है। लेकिन जब पति किसी दूसरी महिला के साथ संबंध बनाता है, तो उसे अपनी पत्नी की सहमति की कोई जरूरत नहीं है।

इस कानून के खिलाफ तर्क दिया जाता है कि एक ऐसा अपराध जिसमें महिला और पुरुष दो लोग लिप्त हों, उसमें केवल पुरुष को दोषी ठहराकर सजा देना लैंगिक भेदभाव है। इसके अलावा महिला के पति को ही शिकायत का हक होना कहीं न कहीं महिला को पति की संपत्ति जैसा दर्शाता है, क्योंकि पति के अलावा महिला का कोई अन्य रिश्तेदार इस मामले में शिकायतकर्ता नहीं हो सकता।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें