सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के उस कानून को वैध करार दिया है, जिसमें जलीकट्टू को एक खेल के तौर पर मान्यता दी गई है। कोर्ट ने कहा है कि तमिलनाडु का जानवरों के साथ क्रूरता कानून (संशोधन), 2017 जानवरों को होने वाले दर्द और पीड़ा को काफी हद तक कम कर देता है। गौरतलब है कि जल्लीकट्टू, जिसे इरुथाझुवुथल भी कहा जाता है, सांडों के साथ खेला जाने वाला खेल है, जिसका आयोजन पोंगल में फसलों की कटाई के दौरान किया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस केएम जोसेफ के नेतृत्व वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने एकमत से निर्णय सुनाते हुए महाराष्ट्र में होने वाली बैलगाड़ी की दौड़ों की मान्यता भी बरकरार रखी। पांच जजों की पीठ के अन्य जजों में जस्टिस अजय रस्तोगी, जस्टिस अनिरुद्ध बोस, जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस सीटी रविकुमार भी शामिल थे।
अनुच्छेद 21 के दायरे में सांडों को लाना न्यायिक दुस्साहस
पीठ ने कहा, अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा) के तहत सुरक्षा एक नागरिक के विपरीत व्यक्ति को प्रदान की गई है, जो कि संविधान के अनुच्छेद 19 (भाषण की स्वतंत्रता आदि के संबंध में कुछ अधिकारों का संरक्षण) में एक मामला है। हमें नहीं लगता कि उक्त संरक्षित तंत्र के भीतर सांडों को लाने के लिए न्यायिक दुस्साहस करना हमारे लिए विवेकपूर्ण होगा। पीठ ने शीर्ष अदालत के 2014 के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि सांडों को ‘जल्लीकट्टू’ आयोजनों या बैलगाड़ी दौड़ के लिए प्रदर्शन करने वाले जानवरों के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है और देशभर में इन उद्देश्यों के लिए उनके उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। 2014 के फैसले में कहा गया है कि जानवरों के वैधानिक अधिकारों को मौलिक अधिकारों के दायरे में लाने के सवाल को सलाहकार स्तर पर छोड़ दिया गया है या न्यायिक सुझाव के रूप में तैयार किया गया है।
तमिलनाडु के कानून मंत्री एस रघुपति ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को ऐतिहासिक बताया और कहा कि हमारी परंपराओं और संस्कृति की रक्षा हुई है।