आधार मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की उस दलील को गलत ठहराया है, जिसमें उसने कहा था कि नागरिकों की बायोमैट्रिक जानकारी जुटाना निजता के अधिकार का उल्लंघन नहीं है। भले ही इनको 2016 में आधार कानून के प्रभावी होने से पहले एकत्रित किया गया हो।
सरकार की ओर से निजता को लेकर पूर्व में दिए गए दो फैसलों का हवाला दिया गया था। सरकार के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने तब कहा था कि निजता मौलिक अधिकार नहीं है। शीर्ष अदालत की पीठ ने कहा था कि इन मामलों में निजता के सवाल ‘अप्रासंगिक’ हो जाते हैं।
चीफ जस्टिस
दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ केंद्र से लगातार पूछ रही है कि 2010 और 2016 के बीच जुटाई गई बायोमैट्रिक जानकारियों की स्थिति क्या है, क्योंकि तब यूआईडीएआई को आधार रजिस्ट्रेशन के लिए निजी ब्यौरा जुटाने के अधिकार नहीं थे।
24 अगस्त, 2017 को नौ जजों की पीठ ने निजता को मौलिक अधिकार बताया था और इसका उल्लंघन होने पर कड़ी कार्रवाई करने को कहा था। आधार मामले में 26वें दिन हुई बहस के दौरान अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने 1950 में एमपी शर्मा और खड़क सिंह (1962) मामले में शीर्ष अदालत के फैसले का हवाला दिया था। उन्होंने कहा, इन मामलों में शीर्ष अदालत ने कहा था कि निजता मौलिक अधिकार नहीं है। इसलिए केंद्र और यूआईडीएआई ने 2010 और 2016 के बीच बायोमैट्रिक जानकारियां जुटाकर निजता के अधिकार का उल्लंघन नहीं किया है।