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Supreme Court: तेलंगाना में 42% पिछड़ा वर्ग आरक्षण के फैसले पर विचार नहीं; केंद्रीकृत पोर्टल पर RBI देगा जवाब

Tue, 07 Oct 2025 07:47 AM IST
ज्योति भास्कर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : एएनआई (फाइल)
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सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय निकायों में पिछड़े वर्गों को 42 फीसदी आरक्षण देने के तेलंगाना सरकार के आदेश को चुनौती वाली याचिका पर विचार करने से इन्कार कर दिया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर अर्जी पर सुनवाई में अनिच्छा दिखाने के बाद, याचिकाकर्ता के वकील ने याचिका वापस ले ली। शीर्ष अदालत ने हालांकि उन्हें हाईकोर्ट जाने की छूट दी।
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वित्तीय संपत्तियों के लिए केंद्रीकृत पोर्टल बनाने की मांग पर आरबीआई से मांगा जवाब
एक अन्य अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और अन्य से उस याचिका पर जवाब मांगा है जिसमें विभिन्न संस्थाओं में मौजूद सभी वित्तीय परिसंपत्तियों की व्यापक सूची तक पहुंचने के लिए एक केंद्रीकृत पोर्टल स्थापित करने के निर्देश देने की मांग की गई है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताते हुए आरबीआई, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी), केंद्र और अन्य को नोटिस जारी कर याचिका पर उनके जवाब मांगे हैं। साथ ही मामले की सुनवाई चार सप्ताह बाद निर्धारित की है।

याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि यह मामला छोटे निवेशकों या जमाकर्ताओं से जुड़ा है। वकील ने कहा, आज की तारीख में यह 3.5 लाख करोड़ रुपये का मामला है। उन्होंने कहा कि यह राशि उनके असली निवेशकों को वापस नहीं की गई है। याचिकाकर्ता के वकील ने पीठ को बताया कि उन्होंने इस मुद्दे पर पहले हाईकोर्ट का रुख किया था। वकील ने आगे कहा, उच्च न्यायालय ने कहा कि यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा है, लेकिन इसे अधिकारियों को देखना है और इसमें किसी भी तरह का न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं है।
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अदालतें याचिका के दायरे से बाहर जाकर केस करने वाले पक्षों को चौंका नहीं सकतीं  
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि कोई अदालत किसी याचिका के दायरे से बाहर जाकर संबंधित पक्षों को चौंकाती है और कोई कठोर टिप्पणी करती है तो इससे अन्य संभावित वादियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने चिन्मय मिशन एजुकेशनल एंड कल्चरल ट्रस्ट और कोचीन देवस्वोम बोर्ड के बीच एक दीवानी विवाद का फैसला करते हुए यह टिप्पणी की। इस मामले में केरल हाईकोर्ट ने एक भूमि के संबंध में लाइसेंस शुल्क तय करने का निर्देश दिया और बोर्ड को मुख्य सतर्कता अधिकारी के जरिये बोर्ड और ट्रस्ट के बीच लेनदेन के संबंध में जांच करने और निष्कर्षों के आधार पर आवश्यक कार्रवाई करने को कहा था। पीठ ने ट्रस्ट की दायर अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए कहा कि वर्तमान मामले में हाईकोर्ट ने अपने पूर्व के निर्णयों को ध्यान में रखते हुए लाइसेंस शुल्क निर्धारित करने का निर्देश दिया लेकिन ट्रस्ट को यह स्पष्ट करने का कोई अवसर नहीं दिया गया कि पूर्व के निर्णय संबंधित लेनदेन पर लागू होते हैं या नहीं।

पीठ ने आगे कहा कि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए मुख्य सतर्कता अधिकारी को अपीलकर्ता को भूमि पट्टे पर देने से संबंधित मामले में जांच करने का निर्देश देना उचित नहीं है। इस प्रकार के निर्देश पक्षों की प्रतिष्ठा और चरित्र पर गंभीर रूप से प्रभाव डाल सकते हैं। यहां तक किसी मामले में भी यदि हाईकोर्ट ऐसे निर्देश पारित करने के लिए बाध्य था तो उसे अपीलकर्ताओं को सूचित करना चाहिए था। हमारा मानना है कि हाईकोर्ट का निर्देश पारित करना उचित नहीं था। ये निर्देश रिट याचिका के दायरे से बहुत परे थे। अपीलकर्ताओं की अपनी ही रिट याचिका में इससे भी बदतर स्थिति नहीं हो सकती थी। इसके अलावा, ये निर्देश अपीलकर्ताओं को सूचित किए बिना ही जारी कर दिए गए हैं। पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता हाईकोर्ट की कार्यवाही से पूरी तरह आश्चर्यचकित हैं।
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