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Supreme Court Update: बाबरी मस्जिद पर टिपप्णी करने वाले छात्र की याचिका खारिज, कोर्ट का केस रद्द करने से इनकार

Tue, 28 Oct 2025 05:23 PM IST
राहुल कुमार न्यूज डेस्क अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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सुप्रीम कोर्ट ने एक कानून के छात्र मोहम्मद फैयाज मंसूरी के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया है। मंसूरी ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट कर लिखा था कि बाबरी मस्जिद एक दिन फिर से बनाई जाएगी। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्य बागची की पीठ ने कहा कि उन्होंने पोस्ट देखी है और वे इस मामले में दखल नहीं देना चाहते।

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याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता तल्हा अब्दुल रहमान ने दलील दी कि पोस्ट में कोई अश्लीलता या भड़काऊ भाषा नहीं थी। उन्होंने कहा कि मंसूरी ने सिर्फ इतना कहा था कि बाबरी मस्जिद उसी तरह बनेगी जैसे तुर्की में एक मस्जिद को फिर से बनाया गया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि भड़काऊ टिप्पणी किसी अन्य व्यक्ति ने की थी, जिसकी जांच नहीं की गई।इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा,  हमने पोस्ट पढ़ ली है। हमसे कोई टिप्पणी न मांगें। अदालत के रुख को देखते हुए अधिवक्ता ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने मंजूर कर लिया।
 
अदालत ने कहा कि यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत सभी बचाव पक्ष की दलीलों पर निचली अदालत द्वारा उनकी योग्यता के आधार पर विचार किया जाएगा। याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 9 सितंबर, 2025 के उस आदेश की वैधता को चुनौती दी थी जिसमें मामले में आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया गया था। विधि स्नातक मंसूरी के खिलाफ 6 अगस्त, 2020 को फेसबुक पर एक "अपमानजनक संदेश" पोस्ट करने का आरोप लगाते हुए एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी। यह प्राथमिकी भारतीय दंड संहिता की धारा 153ए, 292, 505(2), 506 और 509 तथा सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम, 2008 की धारा 67 के तहत दर्ज की गई थी।
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मंसूरी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने से इनकार किया गया था। अगस्त 2020 में उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। इस पोस्ट में एक अन्य व्यक्ति ने हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं, जिसके बाद लखीमपुर खीरी के जिला मजिस्ट्रेट ने मंसूरी की गिरफ्तारी के आदेश दिए थे। हालांकि बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वह गिरफ्तारी आदेश रद्द कर दिया। इस साल की शुरुआत में ट्रायल कोर्ट ने पुलिस की चार्जशीट पर संज्ञान लिया। इसके खिलाफ मंसूरी ने फिर से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने उसे भी खारिज कर दिया। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। 

मेडिकल इंटर्न वजीफा पर सुप्रीम कोर्ट कोर्ट ने कहा-उम्मीद है कि आयोग नींद से जागेगा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रतिदिन 18 घंटे से अधिक काम करने को मजबूर मेडिकल इंटर्न (डॉक्टर) उचित वजीफा के हकदार हैं। कोर्ट ने कहा है कि वजीफा ही वह मूलभूत चीज है जिसके वे हकदार हैं। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजरिया की पीठ ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) की आरे से मेडिकल इंटर्न को वजीफा जारी न करने की कड़ी निंदा की।

याचिकाकर्ता डॉक्टरों का प्रतिनिधित्व कर रही वकील तन्वी दुबे ने पीठ के समक्ष दलील दी कि डॉक्टरों को वजीफा देने से अनुचित रूप से वंचित किया जा रहा है, इसमें भारी देरी हो रही है। उन्होंने कहा कि जिन डॉक्टरों ने याचिकाएं दायर की हैं, वे भी स्नातक हो चुके हैं, फिर भी अथॉरिटी ने कोई कदम नहीं उठाया है। पीठ ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग की ओर से पूछा कि क्या अनुपालन रिपोर्ट दाखिल की गई है। जिस पर आयोग की ओर से 11 जुलाई, 2025 का नोटिस रिकॉर्ड पर रखा।

हालांकि पीठ ने पाया कि 11 जुलाई 2025 के आदेश का अनुपालन अभी तक नहीं हुआ है। इस पर याचिकाकर्ता डॉक्टरों की वकील तन्वी दुबे ने मामले का शीघ्र निपटान करने का अनुरोध किया। जिसके बाद आयोग को 2 सप्ताह की अवधि के भीतर 11 जुलाई, 2025 के नोटिस के संबंध में अनुपालन दर्शाते हुए एक हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि उसे उम्मीद है कि आयोग नींद से जागेगा।
 

सुप्रीम कोर्ट : मानसिक स्वास्थ्य देखभाल कानून पर अमल सबंधी याचिका एनएचआरसी को हस्तांतरित
 सुप्रीम कोर्ट ने मानसिक रोगों से ग्रस्त व्यक्तियों के अधिकारों और आवश्यकताओं के संरक्षण के लिए 2017 में बने कानून पर अमल के लिए दायर जनहित याचिका मंगलवार को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को हस्तांतरित कर दी। आयोग ने एनएचआरसी) से इस मामले की निगरानी करने को कहा।

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने कहा कि मानवाधिकार आयोग को अधिवक्ता गौरव कुमार बंसल की तरफ से 2018 में दायर याचिका पर विचार करना चाहिए। शीर्ष अदालत ने केंद्र के हलफनामे पर गौर किया और कहा कि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 को लागू करने के लिए वैधानिक प्राधिकरण गठित किए गए हैं। लेकिन याचिकाकर्ता ने कई अन्य मांगें भी की हैं जिनकी निगरानी भी एनएचआरसी की तरफ से की जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले कहा था कि संसद ने 2017 में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम पारित किया था, जिसमें केंद्रीय मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण (सीएमएचए), राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण (एसएमएचए) और मानसिक स्वास्थ्य समीक्षा बोर्ड (एमएचआरबी) की स्थापना का प्रावधान है। 2 मार्च को कोर्ट ने केंद्र को इन तीनों निकायों की स्थापना और कार्यप्रणाली का विवरण देते हुए एक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया था। 

दुष्कर्म और हत्या मामले में बरी व्यक्ति ने की मुआवजे की मांग, सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई
 सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई है, जो दुष्कर्म और हत्या के झूठे आरोपों में 12 साल जेल में रहने के बाद बरी हुआ है। यूपी के रहने वाले इस व्यक्ति ने गलत गिरफ्तारी, मुकदमे और सजा के कारण हुए नुकसान के लिए मुआवजे की मांग की है।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा, हम अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल से इस मामले में सहायता चाहेंगे। कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए कहा कि मामले पर 24 नवंबर को फिर सुनवाई की जाएगी। याचिकाकर्ता के मुताबिक, 3 अक्तूबर 2013 को मुझे बिना सबूत गिरफ्तार किया गया। सुप्रीम कोर्ट से बरी किए जाने के बाद इस साल 19 मई को रिहा किया गया। अब मेरी उम्र 41 साल है। याचिकाकर्ता उत्तर प्रदेश के एक गांव का रहने वाला है। याचिका में कहा गया कि केवल रिहाई से न्याय नहीं हुआ है, इसलिए राज्य को 12 साल की गलत कैद के लिए उचित मुआवजा देना चाहिए।
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा, आपराधिक प्रक्रिया की ताकत संयम में भी निहित है, सिर्फ जांच में नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि आपराधिक प्रक्रिया की असली ताकत उतनी ही संयम में निहित है जितनी कि जांच में। अदालत ने 1997 के भ्रष्टाचार मामले में एक शख्स की सजा को रद्द करते हुए उसे बरी कर दिया।

 न्यायालय ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के जुलाई 2011 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें हैदराबाद की ट्रायल कोर्ट द्वारा बरी करने के फैसले को पलटकर आरोपी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी ठहराया गया था। मामले में आरोपी व्यक्ति जनवरी 1996 से सितंबर 1996 तक श्रम विभाग में सहायक आयुक्त के पद पर कार्यरत था। उच्च न्यायालय ने उसे एक वर्ष के कारावास की सजा सुनाई थी।

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची की पीठ ने आरोपी की अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट का दृष्टिकोण साक्ष्यों पर आधारित और तार्किक था। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की विस्तृत विवेचना से जुड़ने के बजाय अपने निष्कर्ष थोप दिए और साक्ष्य में मौजूद कमियों पर ध्यान नहीं दिया।

पीठ ने कहा, आपराधिक प्रक्रिया की ताकत उतनी ही संयम में निहित है जितनी जांच में। जब आरोपी का बरी होना ठोस आधारों पर टिका है, तो उसे बहाल किया जाना चाहिए। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि आरोपी ने शिकायतकर्ता से ठेका श्रमिक लाइसेंस नवीनीकरण के लिए 9,000 रुपये की रिश्वत मांगी थी।
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