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SC Updates: आरजी कर मामले में पीड़ित परिवार का केस नहीं लड़ेंगी वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर, रिपोर्ट्स में दावा

Thu, 12 Dec 2024 02:38 PM IST
नितिन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

बीते साल 9 अगस्त को कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में ड्यूटी पर तैनात पोस्ट-ग्रेजुएट ट्रेनी डॉक्टर का शव बरामद हुआ था। पोस्टमार्टम से पता चला कि डॉक्टर की दुष्कर्म के बाद हत्या की गई थी।
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Supreme Court - फोटो : ANI
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विस्तार
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पश्चिम बंगाल के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में जूनियर डॉक्टर के साथ दुष्कर्म और हत्या मामले में पीड़िता की वकील ने खुद को केस से अलग कर लिया है। वे अब वे इस केस की पैरवी नहीं करेंगी। जबकि पीड़िता के परिजनों ने कहा है कि वे अब दूसरे विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पीड़िता पक्ष की वकील वृंदा ग्रोवर ने मामले की सुनवाई से अपना नाम वापस ले लिया है। अभी सियालदह ट्रायल कोर्ट में मामले की सुनवाई हो रही है। अदालत को इस बारे में सूचित कर दिया गया है, जिसके बाद अदालत ने भी वृंदा ग्रोवर को मामले की सुनवाई से मुक्त कर दिया है। 
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मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार 'कुछ कारणों और परिस्थितियों' के चलते उन्होंने ये फैसला लिया। रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि वकील वृंदा ग्रोवर की लीगल टीम और पीड़िता के परिवार के बीच कई मुद्दों पर तालमेल नहीं बन पा रहा था। जिस वजह से उन्होंने केस छोड़ने का फैसला किया। ग्रोवर के चेंबर ने सितंबर 2024 से पीड़िता के परिवार को सभी अदालतों में कानूनी सेवाएं और प्रतिनिधित्व नि:शुल्क (प्रो बोनो) प्रदान करने का फैसला किया था।

गौरतलब है कि बीते साल 9 अगस्त को कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में ड्यूटी पर तैनात पोस्ट-ग्रेजुएट ट्रेनी डॉक्टर का शव बरामद हुआ था। पोस्टमार्टम से पता चला कि डॉक्टर की दुष्कर्म के बाद हत्या की गई थी। इस मामले की जांच सीबीआई द्वारा की जा रही है।
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आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में दोषी ठहराने के लिए केवल उत्पीड़न पर्याप्त नहीं : न्यायालय
देश के उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि किसी को आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध में दोषी ठहराने के लिए केवल उत्पीड़न पर्याप्त नहीं है और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उकसाने के स्पष्ट सबूत होने चाहिए। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति पीबी वराले की पीठ ने यह टिप्पणी गुजरात उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर अपना फैसला सुनाते हुए की, जिसमें एक महिला को कथित रूप से परेशान करने और उसे आत्महत्या के लिए मजबूर करने के लिए उसके पति और उसके दो ससुराल वालों को आरोपमुक्त करने से इनकार कर दिया गया था।

हाल ही में 34 वर्षीय प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ अतुल सुभाष की आत्महत्या के मामले के मद्देनजर, इस फैसले में की गई न्यायलय की टिप्पणियां महत्वपूर्ण हैं। अतुल सुभाष ने अपनी अलग रह रही पत्नी और उसके परिवार के हाथों उत्पीड़न का आरोप लगाया था। उनकी पत्नी निकिता सिंघानिया, निकिता की मां निशा, पिता अनुराग और चाचा सुशील के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया गया है। शीर्ष अदालत की टिप्पणियां निकिता और उसके परिवार के सदस्यों के लिए मददगार साबित हो सकती हैं।

वर्ष 2021 में भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए (विवाहित महिला के साथ क्रूरता करना) और 306 सहित कथित अपराधों के लिए मामला दर्ज किया गया था, जो आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध से संबंधित है और इसमें 10 साल तक कैद और जुर्माने का प्रावधान है।
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हरियाणा : ईवीएम सत्यापन की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे पूर्व मंत्री दलाल
हरियाणा के पूर्व मंत्री और 5 बार के विधायक करण सिंह दलाल ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के सत्यापन के लिए नीति की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने अपनी याचिका में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में दिए गए शीर्ष अदालत के पहले के फैसले के अनुपालन की मांग की।

दलाल और सह-याचिकाकर्ता लखन कुमार सिंगला अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में दूसरे पर रहे हैं। उन्होंने चुनाव आयोग (ईसी) को ईवीएम के चार घटकों (कंट्रोल यूनिट, बैलट यूनिट, वीवीपैट और सिंबल लोडिंग यूनिट) की मेमोरी या माइक्रोकंट्रोलर की जांच के लिए एक प्रोटोकॉल लागू करने का निर्देश देने की मांग की। इस साल अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने देश में चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता को मजबूत करने के उद्देश्य से एक आदेश जारी किया था, जिसमें किसी चुनाव में दूसरे और तीसरे स्थान पर आए उम्मीदवारों के लिखित अनुरोध पर 5 प्रतिशत ईवीएम की इस्तेमाल मेमोरी/माइक्रोकंट्रोलर की जांच और सत्यापन का निर्देश दिया गया था। यह जांच ईवीएम के निर्माता कंपनियों के इंजीनियर करेंगे। इस दौरान उम्मीदवारों और उनके प्रतिनिधि मौजूद रहेंगे। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि चुनाव आयोग की ओर से ऐसी कोई नीति जारी नहीं की गई है। यह चुनाव आयोग की किसी भी प्रकार की जांच से बचाने की इच्छा को दर्शाता है।
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