फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Supreme Court: शीर्ष अदालत से UBVS अध्यक्ष को बॉम्बे हाईकोर्ट जाने की अनुमति; कर्नाटक के मंत्री पाटिल को झटका

Mon, 04 Aug 2025 12:29 PM IST
पवन पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : एएनआई (फाइल)
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को यह तय किया कि वह 6 अगस्त को तमिलनाडु सरकार की उस याचिका पर सुनवाई करेगा, जिसमें मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई है जिसमें राज्य सरकार को कल्याणकारी योजनाओं में वर्तमान और पूर्व मुख्यमंत्रियों के नाम व तस्वीरें इस्तेमाल करने से रोका गया है। मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी की बात सुनी, जो राज्य सरकार की ओर से पेश हुए। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि मुख्यमंत्री की तस्वीर और नाम का उपयोग कल्याणकारी योजनाओं में किया जा सकता है। इस पर कोर्ट ने बुधवार को सुनवाई के लिए सहमति दी।
विज्ञापन


क्या है मामला?
मद्रास हाईकोर्ट ने 31 जुलाई को अंतरिम आदेश में राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह किसी भी नई या दोबारा शुरू की गई सरकारी योजना का नाम किसी जीवित व्यक्ति के नाम पर न रखे। इसके अलावा, योजनाओं के प्रचार में पूर्व मुख्यमंत्रियों, विचारधारा से जुड़े नेताओं की तस्वीरें या DMK पार्टी के झंडे, चिन्ह आदि के उपयोग पर भी रोक लगा दी गई थी।

किसने दायर की थी याचिका?
AIADMK सांसद सी. वे. शन्मुगम ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर इस मुद्दे को उठाया था। उन्होंने 'उंगलुडन स्टालिन' (आपके साथ स्टालिन) नाम की योजना पर सवाल उठाया था और कहा था कि यह राजनीतिक प्रचार जैसा है।
विज्ञापन


हाईकोर्ट का स्पष्ट निर्देश
हाईकोर्ट ने कहा कि यह रोक केवल नाम और प्रचार सामग्री पर लागू है। राज्य सरकार चाहे तो कोई भी योजना शुरू या लागू कर सकती है, लेकिन उसका नाम किसी नेता के नाम पर नहीं होना चाहिए और प्रचार में भी पार्टी से जुड़े चिन्हों का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। अब तमिलनाडु की DMK सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है और हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी है। मामले की अगली सुनवाई 6 अगस्त को होगी।

सुनील शुक्ला को बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने की अनुमति
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर भारतीय विकास सेना के अध्यक्ष सुनील शुक्ला को बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने की अनुमति दी है। सुनील शुक्ला ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) के प्रमुख राज ठाकरे के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और पार्टी की मान्यता रद्द करने की मांग की थी। उनका आरोप है कि 30 मार्च 2025 को गुड़ी पड़वा रैली में ठाकरे ने भड़काऊ भाषण दिया, जिससे हिंदी बोलने वाले उत्तर भारतीयों पर हमले हुए। मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि उन्होंने याचिका के तथ्यों पर कोई राय नहीं दी है और बॉम्बे हाईकोर्ट से सभी मुद्दों पर विचार करने को कहा है।
 

कर्नाटक के मंत्री शिवानंद एस पाटिल की याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक के मंत्री शिवानंद एस पाटिल की याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने बीजेपी विधायक बी.आर. पाटिल यतनाल के खिलाफ मानहानि का केस बहाल करने की मांग की थी। कोर्ट ने कहा कि ऐसी राजनीतिक लड़ाइयाँ अदालत में नहीं, बल्कि बाहर लड़ी जानी चाहिए। हालांकि बाद में कोर्ट ने एक करोड़ रुपये का लगाया गया जुर्माना माफ कर याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी।

मदरसा छात्रों का स्थानांतरण: NCPCR को हाईकोर्ट जाने की 'सुप्रीम' अनुमति
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि बाल अधिकार संस्था एनसीपीसीआर की तरफ से राज्यों से गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों के छात्रों को सरकारी स्कूलों में स्थानांतरित करने का आग्रह करने वाले पत्र को चुनौती संबंधित उच्च न्यायालय में दी जा सकती है। याचिकाकर्ता संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने उत्तर प्रदेश और त्रिपुरा सरकारों की तरफ से गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों के छात्रों को सरकारी स्कूलों में स्थानांतरित करने के निर्देश देने के फैसले को चुनौती दी है।

न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील से कहा कि वह शीर्ष अदालत की तरफ से पूर्व में दी गई सुरक्षा को बढ़ाएगी और उन्हें उच्च न्यायालय जाने की स्वतंत्रता देगी। पिछले साल 21 अक्तूबर को पारित अपने आदेश में, शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) की तरफ से जारी पत्र और कुछ राज्यों की परिणामी कार्रवाइयों के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी थी।

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने कहा कि शीर्ष अदालत ने परिपत्रों के क्रियान्वयन पर रोक लगाने का अंतरिम आदेश पहले ही दे दिया है। उन्होंने कहा कि मामले की अंतिम सुनवाई जरूरी है। वहीं उत्तराखंड की ओर से पेश वकील ने कहा कि शीर्ष अदालत ने पहले ही संकेत दिया था कि मामला उच्च न्यायालय में जा सकता है। जयसिंह ने कहा कि शीर्ष अदालत की तीन न्यायाधीशों की पीठ इस मामले में पहले ही आदेश पारित कर चुकी है। पीठ ने कहा, 'आप (याचिकाकर्ता) अब भी उच्च न्यायालय जा सकते हैं। यह एक संवैधानिक न्यायालय है।' जयसिंह ने कहा कि जैसे ही प्रतिवादी अपना जवाब दाखिल करेंगे, वह इस मामले में बहस के लिए तैयार हैं।

पूर्व सांसद की आत्महत्या मामला:  सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया, जिसमें पूर्व लोकसभा सांसद मोहन डेलकर की आत्महत्या के मामले में दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई है। इस प्राथमिकी में दादरा और नगर हवेली, दमन और दीव के प्रशासक प्रफुल्ल खोड़ा पटेल समेत नौ लोगों पर आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप था। बॉम्बे हाईकोर्ट ने आठ सितंबर 2022 को इन सभी नौ लोगों के खिलाफ मामले को रद्द कर दिया था।

यह प्राथमिकी तब दर्ज की गई थी, जब दादरा और नगर हवेली से सात बार सांसद रहे मोहन डेलकर 2021 में मुंबई के एक होटल में मृत पाए गए थे। डेलकर के कथित सुसाइड नोट में परेशान करने और डराने-धमकाने की बात लिखी गई थी, जिसके आधार पर पुलिस ने कई लोगों के खिलाफ कार्रवाई की थी, जिनमें वरिष्ठ अफसर और राजनीतिक व्यक्ति भी शामिल थे।
 
विज्ञापन

2022 के फैसले की समीक्षा याचिकाएं सुनवाई योग्य हैं या नहीं,  न्यायमूर्ति सूर्यकांत से बात करेंगे सीजेआई
मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) बी. आर. गवई ने सोमवार को कहा कि वह न्यायमूर्ति सूर्यकांत से बात करेंगे ताकि यह तय किया जा सके कि 2022 के फैसले की समीक्षा याचिकाओं के साथ-साथ नई दायर याचिकाओं को भी एक साथ सूचीबद्ध किया जा सकता है या नहीं। यह फैसला धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) की प्रमुख धाराओं को सही ठहराने से जुड़ा है, जिनमें प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को गिरफ्तारी, तलाशी और संपत्ति जब्त करने के अधिकार दिए गए हैं।

2022 में सुप्रीम कोर्ट ने विजय मदनलाल चौधरी मामले में पीएमएलए की प्रमुख धाराओं को वैध ठहराया था। उस फैसले के बाद से उस पर कई कानूनी चुनौतियां सामने आई हैं, जिनमें समीक्षा याचिकाएं और नई रिट याचिकाएं शामिल हैं, जिनमें उस फैसले को चुनौती दी गई है और उसे बड़ी पीठ के पास भेजने की मांग की गई है। 31 जुलाई को जस्टिस सूर्यकांत, उज्जल भुइयां और एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा था कि वह पहले यह तय करेगी कि 2022 के फैसले की समीक्षा याचिकाएं सुनवाई योग्य हैं या नहीं।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें