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SC Updates: धर्मांतरण कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से जवाब मांगा, छह हफ्ते बाद होगी अगली सुनवाई

Wed, 17 Sep 2025 04:36 AM IST
हिमांशु चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को कई मामलों में सुनावई की। इसी क्रम में धर्मांतरण कानून पर भी सुनवाई हुई। इस मामले में अदालत ने कई राज्यों से उनके धर्मांतरण रोधी कानूनों पर जवाब मांगा है। याचिकाकर्ताओं ने इन्हें असंवैधानिक बताते हुए चुनौती दी है और रोक की मांग की है। कोर्ट ने राज्यों को चार हफ्ते का समय दिया है, जबकि याचिकाकर्ता दो हफ्तों में अपनी प्रतिक्रिया देंगे।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कई राज्यों से उनके धर्मांतरण रोधी कानूनों पर जवाब मांगा है। कोर्ट में दायर याचिकाओं में इन कानूनों की वैधता को चुनौती दी गई है और उन पर रोक लगाने की मांग की गई है। चीफ जस्टिस बी. आर. गवई और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने साफ किया कि राज्यों के जवाब आने के बाद ही इन कानूनों पर रोक लगाने की अर्जी पर विचार होगा।
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सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को चार हफ्ते में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। याचिकाकर्ताओं को इसके बाद दो हफ्ते का समय दिया गया है ताकि वे राज्यों की दलीलों पर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज कर सकें। इस मामले की अगली सुनवाई छह हफ्ते बाद होगी। कोर्ट ने याचिकाकर्ता पक्ष के वरिष्ठ वकील सी. यू. सिंह को याचिका संशोधित करने की भी अनुमति दी है, ताकि उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में किए गए "कड़े बदलावों" को चुनौती में शामिल किया जा सके।

किन राज्यों के कानून चुनौती के दायरे में
याचिकाओं में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, झारखंड और कर्नाटक के धर्मांतरण रोधी कानूनों को चुनौती दी गई है। इन राज्यों ने धार्मिक परिवर्तन को लेकर अलग-अलग प्रावधान बनाए हैं, जिन पर सवाल उठाए जा रहे हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ये कानून संविधान के अनुच्छेद 21 और 25 का उल्लंघन करते हैं, जो व्यक्ति को स्वतंत्रता और धर्म पालन का अधिकार देते हैं।
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याचिकाकर्ताओं की दलील
सीनियर एडवोकेट सी. यू. सिंह ने कोर्ट को बताया कि इन कानूनों के कारण अंतर्धार्मिक विवाह करने वाले लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि कई प्रावधानों में तीसरे पक्ष को शिकायत दर्ज कराने की अनुमति दी गई है, जिससे उत्पीड़न और भी बढ़ गया है। सिंह ने उदाहरण देते हुए कहा कि चर्च में धार्मिक आयोजन तक में भीड़ हस्तक्षेप करती है और इसे कानून का हवाला देकर सही ठहराया जाता है।

अन्य वरिष्ठ वकीलों की राय
सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंग ने मध्य प्रदेश के कानून पर तत्काल रोक की मांग की। वहीं अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने उत्तर प्रदेश और हरियाणा के कानूनों पर रोक लगाने की अर्जी दाखिल की। हालांकि अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के. एम. नटराज ने अंतरिम राहत देने का विरोध किया और कहा कि तीन-चार साल बाद अचानक रोक की मांग उचित नहीं है।

एनजीओ पर सरकार का आरोप
यह मामला नागरिक अधिकार कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ की एनजीओ सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस द्वारा दायर याचिका से भी जुड़ा है। केंद्र सरकार ने इस एनजीओ पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह संगठन चुनिंदा राजनीतिक हितों के कहने पर याचिकाएं दाखिल करता है और दंगों से प्रभावित लोगों के नाम पर चंदा जुटाकर आर्थिक लाभ उठाता है।

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पहले के आदेश और राज्यों के प्रावधान
सुप्रीम कोर्ट पहले भी 2021 में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के धर्मांतरण कानूनों की जांच करने पर सहमत हो चुका है। उत्तर प्रदेश का कानून सभी धर्मांतरणों पर लागू होता है और किसी भी व्यक्ति को धर्म बदलने के लिए विस्तृत प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य करता है। वहीं उत्तराखंड का कानून बलपूर्वक या प्रलोभन से धर्म बदलवाने वालों को दो साल की सजा का प्रावधान करता है। इसमें नौकरी, पैसा या अन्य लाभ देने को भी ‘प्रलोभन’ की श्रेणी में रखा गया है।

याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि ऐसे कानून व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धर्म की स्वतंत्रता पर हमला करते हैं। उनका तर्क है कि विवाह और धर्म पालन व्यक्ति का निजी अधिकार है, जिस पर राज्य का कोई नियंत्रण नहीं होना चाहिए। कोर्ट अब यह तय करेगा कि इन कानूनों का दायरा संविधान के अनुरूप है या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने की 4 हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति की सिफारिश
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाले सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने चार उच्च न्यायालयों में नई नियुक्तियों और न्यायाधीशों को स्थायी किए जाने को मंजूरी दी। इसके तहत अधिवक्ताओं और न्यायिक अधिकारियों की पदोन्नति को मंजूरी दी गई। तीन सदस्यीय कॉलेजियम में न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ भी शामिल हैं।

कॉलेजियम ने सोमवार को हुई एक बैठक में नियुक्तियों और कुछ न्यायाधीशों को स्थायी करने की सिफारिश करते हुए पांच अलग-अलग प्रस्ताव पारित किए। कॉलेजियम ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में दो वरिष्ठ अधिवक्ताओं, जिया लाल भारद्वाज और रोमेश वर्मा को न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत करने को मंजूरी दी। कर्नाटक हाईकोर्ट के लिए, तीन न्यायिक अधिकारियों की पदोन्नति को मंजूरी दी गई। इनमें गीता के. भरतराज शेट्टी, मुरलीधर पाई बोरकट्टे और त्यागराज नारायण इनावली हैं। कॉलेजियम ने वर्तमान में अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में कार्यरत न्यायमूर्ति कुरुबरहल्ली वेंकटरामारेड्डी अरविंद को भी न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया।

त्रिपुरा उच्च न्यायालय में, कॉलेजियम ने न्यायमूर्ति बिस्वजीत पालित, जो अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में कार्यरत थे, को स्थायी न्यायाधीश के रूप में मंजूरी प्रदान की। मद्रास हाईकोर्ट में कॉलेजियम ने सिफारिश की है कि न्यायमूर्ति एन सेंथिलकुमार और न्यायमूर्ति जी अरुल मुरुगन को न्यायालय का स्थायी न्यायाधीश बनाया जाए। दोनों अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में कार्यरत हैं।

वीडियो को साक्ष्य के रूप में ट्रांसक्रिप्ट में बदलना जरूरी नहीं : सुप्रीम कोर्ट
 सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह कानून की आवश्यकता नहीं है कि वीडियो की सामग्री तभी स्वीकार्य होगी जब उसे वीडियो बनाने वाले गवाह के शब्दों में ट्रांसक्रिप्ट में परिवर्तित किया जाए। शीर्ष अदालत ने कहा कि वीडियो युक्त कॉम्पैक्ट डिस्क (सीडी) एक इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड है और साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी की आवश्यकता पूरी होने के बाद यह एक दस्तावेज की तरह स्वीकार्य साक्ष्य बन जाता है।

जस्टिस मनोज मिश्र और जस्टिस उज्जल भुइया की पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि सीडी में रिकॉर्ड किया गया वीडियो एक दस्तावेज की सामग्री के समान है जिसे देखा और सुना जा सकता है ताकि अदालत उचित निष्कर्ष निकाल सके। अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट के 2024 के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें अकोला में गांजे की कथित बरामदगी से संबंधित एनडीपीएस के एक मामले में दोबारा सुनवाई का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट के आदेश को पूरी तरह से गलत और निराधार पाते हुए पीठ ने कहा कि निःसंदेह, ऐसे अवसर आ सकते हैं जहां वीडियो की विषय-वस्तु को समझने के लिए एक व्याख्यात्मक बयान की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन यह मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगा।

हाईकोर्ट ने कहा था कि तलाशी और जब्ती कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग सर्वोत्तम साक्ष्य थी, लेकिन इसे स्वीकार्य साक्ष्य में नहीं बदला गया। न्यायालय ने यह भी कहा था कि प्रत्येक गवाह का बयान दर्ज करते समय वीडियो नहीं चलाया गया ताकि गवाह अपनी गवाही में वीडियो को अपने शब्दों में समझा सके। हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि वीडियो की कोई ट्रांसक्रिप्ट(प्रतिलिपि) तैयार नहीं की गई थी और जब इसे अदालत में चलाया गया तो वीडियो से संबंधित गवाहों के व्याख्यात्मक बयान के अभाव में इसकी विषय-वस्तु समझ में नहीं आई। हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता कैलाश और अन्य की तरफ से अपनी दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ दायर याचिका पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया।  

बेंगलुरु में एआरएम का नया ऑफिस, भारत में बनेगा टू-नैनोमीटर चिप
 केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मंगलवार को ब्रिटिश सेमीकंडक्टर कंपनी एआरएम का नया ऑफिस बेंगलुरु में उद्घाटित किया। इस यूनिट में कंपनी दो-नैनोमीटर चिप्स डिजाइन करेगी वैष्णव ने कहा कि 2014 के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में स्थिर और दूरदर्शी नीतियों की वजह से भारत ने सेमीकंडक्टर क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। उन्होंने कहा, “हमारे प्रधानमंत्री ने हमें 2047 तक ‘विकसित भारत’ बनाने की नई ऊर्जा और नई सोच दी है।”
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सहायक मंडल अभियंता की अकूत संपत्ति...2.18 करोड़ रुपये मिले
 भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने तेलंगाना दक्षिणी विद्युत वितरण कंपनी के सहायक मंडल अभियंता अंबेडकर एरुगु के घर से 2.18 करोड़ रुपये नकद जब्त किए हैं। इसके बाद एरुगु को गिरफ्तार कर लिया गया। एसीबी ने मंगलवार को एरुगु के घर समेत 10 ठिकानों पर छापे मारे। इस दौरान एक फ्लैट, एक भूतल व पांच मंजिला इमारत, 10 एकड़ भूमि पर एक कंपनी, छह आवासीय भूखंड, एक कृषि भूमि, दो गाड़ी, सोने के आभूषण और बैंक जमा सहित कई संपत्तियों का पता चला। 
 
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