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SC: पुलिस थानों में CCTVs की कमी की रिपोर्ट पर कोर्ट सख्त; कश्मीरी अलगाववादी नेता की याचिका पर एनआईए को नोटिस

Thu, 04 Sep 2025 11:23 AM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरों की कमी से जुड़ी एक मीडिया रिपोर्ट पर स्वतः संज्ञान लिया। जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि रिपोर्ट के अनुसार इस साल राजस्थान में पुलिस हिरासत में 11 मौतें हुईं। एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कश्मीरी अलगाववादी नेता शब्बीर अहमद शाह की उस याचिका पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) से जवाब मांगा। याचिका में उन्होंने आतंकवाद के वित्तपोषण के एक मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय की ओर से उन्हें जमानत देने से इनकार करने के आदेश को चुनौती दी है। हालांकि, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने उन्हें अंतरिम जमानत देने से इनकार कर दिया।

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई
पहले जानते हैं कश्मीरी अलगाववादी नेता शब्बीर अहमद शाह की याचिका के बारे में
शाह की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने अंतरिम जमानत की मांग करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता बहुत बीमार है। पीठ ने उच्च न्यायालय के इस साल 12 जून के आदेश को चुनौती देने वाली शाह की याचिका पर एनआईए को नोटिस जारी किया। पीठ ने मामले की सुनवाई दो हफ्ते बाद तय की। हाईकोर्ट ने इस मामले में उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया था, यह देखते हुए कि उनकी ओर से इसी तरह की गैरकानूनी गतिविधियां करने और गवाहों को प्रभावित करने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। शाह को एनआईए ने 4 जून, 2019 को गिरफ्तार किया था। एनआईए ने 2017 में 12 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था, जिन पर पथराव, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साजिश रचकर अशांति फैलाने के लिए धन जुटाने और इकट्ठा करने की साजिश रचने का आरोप था।

सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो) - फोटो : ANI
अब  पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरों की कमी के मामले को जानिए...
शीर्ष न्यायालय ने 2018 में मानवाधिकारों के हनन को रोकने के लिए पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने का आदेश दिया था। गुरुवार को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा, '...हम 'पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरों की कमी' शीर्षक से एक स्वतः संज्ञान जनहित याचिका दर्ज करने का निर्देश दे रहे हैं, क्योंकि ऐसी खबरें आई हैं कि इस साल पिछले सात-आठ महीनों में पुलिस हिरासत में लगभग 11 मौतें हुई हैं।'

दिसंबर 2020 में शीर्ष अदालत ने केंद्र को सीबीआई, ईडी और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) सहित जांच एजेंसियों के कार्यालयों में सीसीटीवी कैमरे और रिकॉर्डिंग उपकरण लगाने का निर्देश दिया था। इसने कहा था कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रत्येक पुलिस स्टेशन, सभी प्रवेश और निकास बिंदुओं, मुख्य द्वार, लॉक-अप, गलियारों, लॉबी और रिसेप्शन के साथ-साथ लॉक-अप रूम के बाहर के क्षेत्रों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं, ताकि कोई भी हिस्सा खुला न रहे।

सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई (फाइल)
ऑनलाइन गेमिंग कानून मामले में सरकार पहुंची सर्वोच्च न्यायालय
केंद्र ने गुरुवार को सर्वोच्च न्यायालय से ऑनलाइन गेमिंग अधिनियम, 2025 को चुनौती देने वाली याचिकाओं को अलग-अलग हाईकोर्ट से शीर्ष अदालत में स्थानांतरित करने की मांग की, ताकि परस्पर विरोधी फैसलों से बचा जा सके। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ के समक्ष याचिका का उल्लेख किया गया। वकील ने कहा, 'केंद्र ने एक स्थानांतरण याचिका दायर की है। ऑनलाइन गेमिंग विनियमन अधिनियम को तीन उच्च न्यायालयों में चुनौती दी गई है। अगर इसे सोमवार को सूचीबद्ध किया जा सकता है, क्योंकि यह कर्नाटक उच्च न्यायालय के समक्ष अंतरिम आदेशों के लिए सूचीबद्ध है, तो यह उचित है।' मुख्य न्यायाधीश ने याचिका को अगले सप्ताह विचार के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति व्यक्त की।

नाबालिग से दुष्कर्म-हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा रोकी
सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को गुरुग्राम में सात साल पहले तीन साल की बच्ची से दुष्कर्म-हत्या के दोषी की मौत की सजा पर रोक लगा दी। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा निचली अदालत द्वारा सुनाई गई मौत की सजा की पुष्टि करने के आदेश के खिलाफ दोषी की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। पीठ ने मामले की सुनवाई 12 हफ़्ते बाद स्थगित करते हुए कहा, 'अपीलकर्ता को दी गई मौत की सजा पर रोक रहेगी।' पीठ ने सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री से निचली अदालत और हाईकोर्ट से मामले के मूल रिकॉर्ड मंगवाने को कहा। पीठ ने संबंधित जेल अधीक्षक को निर्देश दिया कि वे अपीलकर्ता का सरकारी अस्पताल से मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन करवाएं। अपीलकर्ता से संबंधित सभी परिवीक्षा अधिकारियों की रिपोर्ट के अलावा, मूल्यांकन रिपोर्ट हरियाणा के वकील के माध्यम से आठ हफ्ते के भीतर शीर्ष अदालत में पेश करनी होगी।

पीओपी मूर्तियों के विसर्जन पर सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को महाराष्ट्र सरकार से उस याचिका पर जवाब मांगा जिसमें, बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेशों को चुनौती दी गई है। इन आदेशों में प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) से बनी मूर्तियों के निर्माण और विसर्जन की अनुमति दी गई थी। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने राज्य सरकार, महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और कई नगर निकायों को नोटिस जारी किया। यह याचिका रोहित मनोहर जोशी ने दायर की है। याचिकाकर्ता ने कहा है कि हाईकोर्ट के 9 जून और 24 जुलाई के आदेश पूर्ववर्ती निर्देशों के विपरीत हैं। पहले पीओपी मूर्तियों पर सख्त रोक थी और विसर्जन से पहले अदालत की स्वीकृति अनिवार्य थी। लेकिन 24 जुलाई को हाईकोर्ट ने राज्य की मूर्ति विसर्जन नीति को मार्च 2026 तक बढ़ा दिया और पीओपी मूर्तियों की अधिकतम ऊंचाई पांच फीट से बढ़ाकर छह फीट कर दी। पर्यावरणविदों का कहना है कि पीओपी से बनी मूर्तियां जलाशयों में घुलती नहीं हैं और उनके रसायन पानी को प्रदूषित करते हैं, जिससे जलीय जीवन पर गंभीर खतरा होता है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि हाईकोर्ट के आदेश केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के दिशानिर्देशों के विपरीत हैं। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल हाईकोर्ट के आदेशों पर रोक नहीं लगाई है, लेकिन सभी पक्षों से जवाब मांगा है। अगली सुनवाई में अदालत मामले पर विस्तृत विचार करेगी।

सुपरटेक रियलटर्स परियोजनाओं में सह-डेवलपर की निगरानी के लिए समिति बना सकता है सुप्रीम कोर्ट
 सुप्रीम कोर्ट ने सुपरटेक रियल्टर्स के अटके पड़े आवासीय अपार्टमेंट, कार्यालय, रिटेल स्टोर और एक लग्जरी होटल के निर्माण के लिए बोली प्रक्रिया की निगरानी और एक सह-डेवलपर की नियुक्ति के लिए समिति बनाने पर पर विचार किया। सुपरटेक रियल्टर्स संकटग्रस्त रियल्टी कंपनी सुपरटेक की एक सहायक कंपनी है, जो समूह की कुछ अन्य कंपनियों के साथ दिवालियापन की कार्यवाही का सामना कर रही है।

जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने घर खरीदारों के हितों की रक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया और परियोजना के विकास के लिए सुपरटेक रियल्टर्स और परमेश कंस्ट्रक्शन कंपनी के बीच समझौते को मंजूरी देने से इनकार कर दिया। पीठ ने प्रमोटर राम किशोर अरोड़ा के वकील श्याम दीवान से कहा, हमें आगे बढ़ने की जरूरत है। हम एक समिति नियुक्त कर सकते हैं जो परियोजना को पूरा करने के लिए सह-डेवलपर की नियुक्ति हेतु बोली प्रक्रिया की देखरेख करेगी। इससे प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने में मदद मिलेगी। परमेश कंस्ट्रक्शन कंपनी या कोई अन्य कंपनी परियोजनाओं के लिए सह-डेवलपर बनने के लिए बोली लगा सकती है। अंतरिम समाधान पेशेवर (आईआरपी) को प्रक्रिया में बाधा डालने से रोकने वाली पीठ ने उनसे कार्यवाही में बाधा न डालने को कहा। पीठ ने आईआरपी के वकील से कहा, सब कुछ स्थगित रखें। साथ ही पीठ ने उनसे समिति की नियुक्ति और आगे की रणनीति पर सभी हितधारकों से सुझाव आमंत्रित करते हुए अपनी वेबसाइट पर एक नोटिस डालने को कहा। न्यायमित्र की रिपोर्ट पर भी किया गौरपीठ ने न्यायमित्र वकील राजीव जैन की रिपोर्ट पर भी गौर किया और कहा कि राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) के 13 अगस्त के आदेश में परमेश कंस्ट्रक्शन कंपनी के खिलाफ कुछ प्रतिकूल टिप्पणियां की गई हैं। सुपरनोवा अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन के वकील गोविंद जी ने दावा किया कि सुपरटेक रियल्टर्स और आईआरपी की ओर से अभ्यावेदन देने के बावजूद, घर खरीदारों के सामने आने वाली समस्याओं को कम नहीं किया गया। पीठ ने कहा कि घर खरीदारों के सामने आने वाली समस्याओं का समाधान किया जाएगा और गोविंद जी को 8 सितंबर तक न्यायमित्र को सुझाव देने के लिए कहा और मामले की अगली सुनवाई 12 सितंबर के लिए स्थगित कर दी।

दुष्कर्म के मामले में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर को सुप्रीम राहत, अदालत ने कहा आरोप झूठे
सुप्रीम कोर्ट ने 40 वर्षीय महिला के दुष्कर्म में आरोपी 23 वर्षीय सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर को जमानत दे दी। अदालत ने कहा कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप झूठे और बेबुनियाद थे।

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने कहा कि नोटिस जारी होने के बावजूद शिकायतकर्ता पेश नहीं हो रही है। पीठ ने आरोपी के वकील के इस तर्क पर भी गौर किया कि यह रिश्ता सहमति से बना था। पीठ ने पूछा कि दिल्ली पुलिस सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर के खिलाफ दुष्कर्म का मामला कैसे दर्ज कर सकती है, जबकि महिला स्वेच्छा से उसके साथ गई थी। पीठ ने कहा, एक हाथ से ताली नहीं बज सकती। आपने किस आधार पर आईपीसी की धारा 376 के तहत मामला दर्ज किया है? वह बच्ची नहीं है। महिला 40 साल की है। वे दोनों साथ में जम्मू गए थे। आपने धारा 376 क्यों लगाई है? यह महिला सात बार जम्मू जाती है और उसके पति को कोई परेशानी नहीं होती।

केंद्र का पीठ को आश्वासन-दिव्यांग कैडेट्स को ईसीएचएस में मिलेगा मुफ्त इलाज
सैन्य प्रशिक्षण के दौरान चोट या दिव्यांगता के कारण सेवा से बाहर कर दिए गए कैडेट्स को अब बड़ी राहत मिलने जा रही है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को आश्वासन दिया है कि ऐसे सभी कैडेट्स को अब पूर्व सैनिक अंशदायी स्वास्थ्य योजना (ईसीएचएस) के तहत चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ के सामने केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि 29 अगस्त से सभी अयोग्य घोषित कैडेट्स को ईसीएसएसमें शामिल कर लिया गया है। इतना ही नहीं, इनसे कोई शुल्क भी नहीं लिया जाएगा। 

थानों में सीसीटीवी कैमरों की कमी, शीर्ष कोर्ट ने दर्ज की जनहित याचिका
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पुलिस हिरासत में हुई कई मौतों को देखते हुए थानों में सीसीटीवी कैमरों की कमी के संबंध में बृहस्पतिवार को स्वतः संज्ञान लिया है। अखबार में छपी एक खबर में पिछले आठ-नौ महीनों में पुलिस थानों में हुई 11 मौतों का हवाला दिए जाने के बाद जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने इस मुद्दे को लेकर एक जनहित मामला दर्ज करने का निर्देश दिया। जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस अनिरुद्ध बोस (सभी अब सेवानिवृत्त) की पीठ ने दिसंबर, 2020 में एक फैसले में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सभी पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने का निर्देश दिया था।
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जमानत सिर्फ रिहा करने वाला यांत्रिक आदेश नहीं : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जमानत को केवल किसी व्यक्ति को हिरासत से रिहा करने वाले यांत्रिक आदेश के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी इलाहाबाद हाईकोर्ट की उस प्रथा पर की है, जिसमें कई मामलों में धमकी देने के बावजूद आरोपियों की जमानत रद्द करने के बजाय गवाहों को संरक्षण योजना का लाभ उठाने के लिए बाध्य किया जाता है।

जस्टिस जेबी पारदीवाला व जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा िक परेशान करने वाली बात यह है कि सरकारी वकील ने कानून की सही स्थिति बताकर जज को सही दिशा में मदद नहीं की। इसके बजाय उसने खुद आग्रह किया कि गवाह या शिकायतकर्ता को गवाह संरक्षण योजना के तहत राहत दी जाए।

हालांकि उसे आरोपी की जमानत रद्द करने की मांग करनी चाहिए थी क्योंकि उसने जमानत आदेश की शर्तों का उल्लंघन कर डराया-धमकाया था। हम इसकी निंदा करते हैं। पीठ ने कहा, जमानत आदेश की शर्तों के उल्लंघन के आधार पर जमानत देने एवं उसे रद्द करने और इस योजना के तहत गवाह को सुरक्षा प्रदान करने के बीच एक सूक्ष्म, लेकिन प्रासंगिक अंतर है। अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट के अनुसार, गवाह संरक्षण योजना एक वैकल्पिक उपाय है।

गवाह संरक्षण योजना
पीठ ने बताया कि गवाह सुरक्षा योजना उपचारात्मक उपाय है, जिसे धमकियों के प्रभाव को बेअसर करने के लिए बनाया गया है। दूसरी ओर, जमानत रद्द करना आपराधिक अदालत का निवारक और पर्यवेक्षी कार्य है, जिसका कर्तव्य यह सुनिश्चित करना है कि मुकदमा धमकियों से अदूषित रहे। पीठ ने कहा, पहला दायित्व राज्य का है, जबकि दूसरा न्यायिक प्रकृति का है, जो न्यायालयों की अंतर्निहित शक्ति से उत्पन्न होता है। एक के स्थान पर दूसरे को प्रतिस्थापित करना न्यायालय के अधिकार को कम करना है। जमानत रद्द करने के प्रावधानों को निरर्थक बनाना है।
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