सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और दिल्ली पुलिस को रियल एस्टेट कंपनी यूनिटेक लिमिटेड के निदेशकों के खिलाफ दर्ज मामलों का पूरा ब्योरा देने का निर्देश दिया। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि मुकदमों की सुनवाई में अनिश्चितकाल तक देरी नहीं होनी चाहिए। अदालत ने इन मामलों की विशेष सुनवाई के लिए विशेष अदालत बनाने की बात कही। मामले की अगली सुनवाई 30 सितंबर को होगी।
विज्ञापन
सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल किया कि घर खरीदारों का पैसा कहां गया और क्या यह देश से बाहर भेजा गया। अदालत को बताया गया कि यूनिटेक निदेशकों के खिलाफ मामलों की जांच दो हिस्सों में हो रही है। कुछ मामलों की जांच ईडी कर रही है, जबकि आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) 63 मामलों में आरोप पत्र दाखिल कर चुकी है।
यूनिटेक के करीब 22,000 घर खरीदार कई वर्षों से अपने घरों का इंतजार कर रहे हैं। फोरेंसिक ऑडिट के अनुसार, पूर्व प्रमोटर संजय चंद्रा और अजय चंद्रा के कार्यकाल में करीब 29,800 खरीदारों से 14,270 करोड़ रुपये और छह वित्तीय संस्थानों से 1,805 करोड़ रुपये मिले थे। ऑडिट में खरीदारों की 5,063 करोड़ और वित्तीय संस्थानों की 763 करोड़ रुपये की राशि का इस्तेमाल नहीं किए जाने की बात कही गई थी। साथ ही, 2007 से 2010 के बीच टैक्स-हेवन देशों में हाई-वैल्यू निवेश किए जाने की बात सामने आई थी।
विज्ञापन
दिव्यांगता पेंशन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: 271 अपीलें खारिज, कहा, 2015 की सिफारिश अब तक लागू क्यों नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सैनिकों की दिव्यांगता पेंशन से जुड़े केंद्र के खिलाफ 271 अपीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा, 2015 में रक्षा मंत्रालय की समिति ने ऐसे मामलों में सरकार की अपीलें तत्काल वापस लेने की सिफारिश की थी, लेकिन उसका पूरी तरह पालन नहीं हुआ। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने 15 सितंबर को दिए फैसले में रक्षा मंत्रालय की 2015 की ‘रक्षा मंत्री रिपोर्ट’ का उल्लेख किया। रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में कई दिव्यांग सैनिकों को तकनीकी आधारों पर पेंशन लाभ से वंचित किया जा रहा है। समिति ने ऐसे मामलों में लंबित अपीलें वापस लेने की सिफारिश की थी। पीठ ने कहा कि मंत्रालय की सिफारिश स्वीकार किए जाने के बावजूद इस तरह के मामले दायर होते रहे हैं। अदालत ने यह भी कहा कि करीब 271 सिविल अपीलों और विशेष अनुमति याचिकाओं में अधिकांश समय-सीमा से बाहर दायर की गई थीं। मामलों में रिहाई मेडिकल बोर्ड ने शुरुआती आकलन में पूर्व सैनिकों की दिव्यांगता को सैन्य सेवा से संबंधित या उससे बढ़ी हुई नहीं माना था। विभागीय अपीलें खारिज होने के बाद पूर्व सैनिकों ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) या हाईकोर्ट का रुख किया, जहां उन्हें दिव्यांगता पेंशन देने के आदेश दिए गए।
स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता पर राज्यों को सुप्रीम फटकार, गिना रहे कागजी उपलब्धियां
सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता के निर्देशों के पालन में लापरवाही बरतने और जमीनी हकीकत पेश न करने पर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के कामकाज पर कड़ी नाराजगी जताई है और बेहद सख्त टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, राज्यों द्वारा दाखिल जवाब सिर्फ एक औपचारिकता लगते हैं। जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा सौंपे गए जवाब और हलफनामे बिना सोचे-समझे दाखिल किए गए हैं और जमीनी हकीकत को बिल्कुल नहीं दर्शाते।
डीईओ को सौंपा स्कूलों की जांच का जिम्मा
सर्वोच्च अदालत ने अब जिला शिक्षा अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे स्कूलों की वास्तविक स्थिति की जांच करें। कोर्ट ने सभी सरकारी और निजी स्कूलों में कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं को मुफ्त बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन और अलग शौचालय उपलब्ध कराने का आदेश दिया था। अदालत ने पहले ही स्पष्ट किया है कि मासिक धर्म स्वास्थ्य एक मौलिक अधिकार है। कोर्ट ने केंद्र सरकार के हलफनामे की समीक्षा के बाद माना कि हालांकि कुछ प्रगति हुई है, लेकिन देश में मासिक धर्म स्वास्थ्य के अधिकार को वास्तव में सार्थक बनाने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
जब अयोग्यता लंबित हो तो विधायी बहुमत कितना सुरक्षित : शीर्ष कोर्ट
शिवसेना पर नियंत्रण और चुनाव चिह्न के विवाद की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक अहम सवाल उठाया। अदालत ने पूछा कि जिन विधायकों की सदस्यता पर अयोग्यता की कार्यवाही लंबित हो, क्या उन्हीं की संख्या के आधार पर किसी राजनीतिक दल में विधायी बहुमत को निर्णायक कसौटी माना जा सकता है?
सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ के समक्ष एकनाथ शिंदे गुट के वकील नीरज किशन कौल ने निर्वाचन आयोग के उस फैसले का बचाव किया, जिसके तहत शिंदे गुट को मूल शिवसेना माना गया। उसे पार्टी का नाम व चुनाव चिह्न दिया गया। इस पर पीठ ने पूछा, हालांकि विधायी बहुमत एक प्रासंगिक कसौटी है, लेकिन क्या यह हर स्थिति में निर्णायक या सुरक्षित कसौटी हो सकती है, जब उन्हीं विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही लंबित हो? कौल ने कहा कि निर्वाचन आयोग ने मामले की विशिष्ट परिस्थितियों को देखते हुए विधायी बहुमत को सबसे व्यावहारिक कसौटी माना था। उन्होंने उद्धव ठाकरे गुट की इस दलील को खारिज किया कि सुभाष देसाई मामले में सुप्रीम कोर्ट ने विधायी बहुमत को कसौटी के तौर पर अपनाने पर रोक लगा दी है। उस फैसले में भी यह स्वीकार किया गया है कि निर्वाचन आयोग अपने व्यापक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए मामले की परिस्थितियों के अनुरूप उपयुक्त कसौटी तय कर सकता है। यदि उपलब्ध अन्य कसौटियां लागू करना संभव न हों तो आयोग व्यावहारिक कसौटी अपना सकता है।
समय पर किस्त नहीं चुकाई तो भी आधी रात वाहन नहीं छीन सकते
सुप्रीम कोर्ट ने कर्ज की किस्तें समय पर नहीं चुका पाने वाले वाहन मालिकों को बड़ी राहत देते हुए कहा कि बैंक और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) कर्ज वसूली के लिए मनमाने तरीके से वित्तपोषित वाहन नहीं छीन सकतीं। अदालत ने भारतीय रिजर्व बैंक को निर्देश दिया कि वह बैंकों और एनबीएफसी को जारी अपने दिशा-निर्देशों का वास्तविक अनुपालन सुनिश्चित करे।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा व जस्टिस अलोक अराधे की पीठ ने यह आदेश ट्रक मालिक हरि दत्त शर्मा के मामले में दिया। अदालत ने चोलामंडलम इन्वेस्टमेंट एंड फाइनेंस कंपनी लि. को उनका ऋण खाता बंद करने, वाहन की बिक्री से मिली 4.5 लाख रुपये की राशि छह फीसदी सालाना ब्याज के साथ लौटाने और अनधिकृत जब्ती से हुई मानसिक पीड़ा तथा आजीविका के नुकसान के लिए 10 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआई को निर्देश दिया कि वह एनबीएफसी और अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों में इन नियमों का वास्तविक अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कदम उठाए, ताकि किसी नागरिक को बिना नोटिस और कानूनी प्रक्रिया के रात में उसकी आजीविका से वंचित करने जैसी घटनाएं दोबारा न हों। एजेंसी
कानूनी तरीके से ही हो सकती है जब्ती
जस्टिस नरसिम्हा ने फैसले में कहा कि यदि ऋण समझौते में वित्तपोषित वाहन का कब्जा लेने का प्रावधान है तो इसका इस्तेमाल कानून और सार्वजनिक नीति के अनुरूप ही किया जा सकता है। कर्जदार के डिफॉल्ट करने का मतलब यह नहीं है कि कर्ज देने वाले वाहन कब्जे में लेने की खुली छूट मिल गई।