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Supreme Court Updates: दिव्यांगों के लिए अनिवार्य पहुंच मानक करें स्थापित, सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को निर्देश

Fri, 08 Nov 2024 02:06 PM IST
पवन पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला
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Supreme Court - फोटो : PTI
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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र सरकार को तीन महीने के भीतर अनिवार्य पहुंच मानकों को लागू करने का निर्देश दिया, जिसका उद्देश्य दिव्यांगों के लिए सार्वजनिक स्थानों तक पहुंच में सुधार करना है। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने यह आदेश 15 दिसंबर, 2017 को एक फैसले में अदालत की तरफ से जारी किए गए पहुंच निर्देशों पर धीमी प्रगति के जवाब में दिया है।
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इस पीठ में न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल थे, जिसने दिव्यांगों के लिए सार्वजनिक स्थानों तक 'सार्थक पहुंच' की जरुरत को रेखांकित किया और दो-आयामी दृष्टिकोण को अनिवार्य किया: मौजूदा बुनियादी ढांचे को पहुंच मानकों के अनुकूल बनाना और यह सुनिश्चित करना कि सभी नए बुनियादी ढांचे को शुरू से ही समावेशी बनाया जाए। पीठ ने पाया कि दिव्यांगों के अधिकार (आरपीडब्ल्यूडी) अधिनियम के नियमों में से एक लागू करने योग्य, अनिवार्य मानकों को स्थापित नहीं करता है, बल्कि यह दिशानिर्देशों के माध्यम से स्व-नियमन पर निर्भर करता है।

यह स्वीकार करते हुए कि सुलभता अधिकार क्रमिक प्राप्ति के अधीन हैं, इस पर पीठ ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों को वास्तव में समावेशी बनाने के लिए गैर-परक्राम्य मानकों की आधार रेखा आवश्यक है। इसके साथ ही पीठ ने सिफारिश की कि ये अनिवार्य नियम व्यापक दिशा-निर्देशों से अलग हों, जिनमें विशिष्ट मानक हों जिन्हें कानूनी रूप से लागू किया जा सके। हैदराबाद में NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में विकलांगता अध्ययन केंद्र को इन नए मानकों को विकसित करने में सरकार की सहायता करने का काम सौंपा गया है। दिशा-निर्देशों को पूर्णता प्रमाणपत्रों को रोकने और गैर-अनुपालन के लिए जुर्माना लगाने जैसे तंत्रों के माध्यम से अनुपालन सुनिश्चित करने की भी आवश्यकता होगी।
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आयुष्मान भारत में आयुर्वेद, योग को शामिल करने की याचिका पर केंद्र को नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय आयुष्मान भारत योजना में आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा को शामिल करने की मांग वाली याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा है। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर याचिका पर केंद्र और अन्य को नोटिस जारी किया।

पीएम-जेएवाई में आयुर्वेद पद्धतियों को शामिल करने की मांग करने वाली याचिका, जिसे आयुष्मान भारत के नाम से भी जाना जाता है, में कहा गया है कि इसे शामिल करने से देश की आबादी के एक बड़े हिस्से को किफायती स्वास्थ्य सेवा लाभ और विभिन्न गंभीर बीमारियों में स्वास्थ्य सेवा प्राप्त करने का अवसर मिलेगा, साथ ही आयुर्वेद के क्षेत्र में काम करने वाले कई लोगों को रोजगार भी मिलेगा।

2018 में शुरू की गई आयुष्मान भारत योजना के दो मुख्य घटक हैं - पीएम-जेएवाई और स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र। पहले में हर साल बीपीएल परिवार को 5 लाख रुपये का कैशलेस स्वास्थ्य बीमा कवर दिया जाता है। याचिकाकर्ता ने इस योजना को सभी राज्यों और भारतीय स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों में लागू करने की मांग की। इसमें कहा गया है, पीएम-जेएवाई, यानी आयुष्मान भारत मुख्य रूप से एलोपैथिक अस्पतालों और औषधालयों तक ही सीमित है, जबकि भारत में आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, सिद्ध, यूनानी, होम्योपैथी समेत कई स्वदेशी चिकित्सा प्रणालियां हैं, जो भारत की समृद्ध परंपराओं में निहित हैं और वर्तमान समय की स्वास्थ्य सेवा आवश्यकताओं को पूरा करने में अत्यधिक प्रभावी हैं।

इस याचिका में दावा किया गया है कि विदेशी शासकों की तरफ से बनाई गई कई नीतियों और औपनिवेशिक मानसिकता वाले व्यक्तियों के कारण भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक ज्ञान के साथ-साथ वैज्ञानिक विरासत भी व्यवस्थित रूप से नष्ट हो गई है। इसमें आरोप लगाया गया है कि लाभ-उन्मुख दृष्टिकोण से प्रेरित इन विदेशियों ने हमारे देश की स्वतंत्रता के समय कई कानूनों और योजनाओं को सोच-समझकर लागू किया है, जिन्होंने धीरे-धीरे हमारी समृद्ध विरासत और इतिहास को कमजोर कर दिया है।


झारखंड सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को जारी किया नोटिस

झारखंड सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी किया है। झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य में बांग्लादेश से अवैध अप्रवासियों के आरोपों की जांच के लिए तथ्य-खोजी समिति गठित करने के अंतरिम आदेश को चुनौती दी है। समिति में केंद्र सरकार के अधिकारी शामिल होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर केंद्र और हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता से जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 3 दिसंबर को होगी।

 

सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों में 'योग मित्र' प्रशिक्षक नियुक्त करने की याचिका पर विचार करने से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सभी राज्यों को स्कूली बच्चों के लिए 'योग मित्र' प्रशिक्षक नियुक्त करने के निर्देश देने की मांग वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय से कहा कि यह एक नीतिगत मामला है।

सीजेआई ने टिप्पणी की, एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जो योग का अभ्यास करता है, मैं कह सकता हूं कि यह विकास के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन यह पूरी तरह से सरकार के नीतिगत क्षेत्र में आता है। जब अश्विनी कुमार उपाध्याय ने अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, तो पीठ ने इसकी अनुमति दे दी। इस याचिका में कहा गया है कि शिक्षा में योग को शामिल करने से न केवल अनुच्छेद 21 के तहत बच्चों के स्वास्थ्य के अधिकार को बरकरार रखा गया है, बल्कि अनुच्छेद 21ए के तहत उनके शिक्षा के अधिकार को भी पूरा किया गया है।

मणिपुर हिंसा: सुप्रीम कोर्ट ने कुकी संगठन को सबूत पेश करने का दिया निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कुकी संगठन को कुछ लीक हुए ऑडियो क्लिप की प्रामाणिकता को दर्शाने के लिए सबूत पेश करने का निर्देश दिया, जिसके आधार पर उसने जातीय हिंसा में मणिपुर के मुख्यमंत्री की कथित भूमिका की अदालत की निगरानी में एसआईटी जांच की मांग करते हुए याचिका दायर की थी।

भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने यह भी कहा कि संवैधानिक न्यायालय के रूप में उसका कर्तव्य है और वह चीजों को दबाने के किसी भी प्रयास को पसंद नहीं करती है। पीठ ने कुकी ऑर्गनाइजेशन फॉर ह्यूमन राइट्स ट्रस्ट (कोहूर) की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण से ऑडियो क्लिप की विश्वसनीयता दिखाने के लिए सामग्री रिकॉर्ड पर रखने को कहा। पीठ ने कहा, अदालत ऑडियो क्लिप के आधार पर प्रस्तुत किए गए तर्कों पर विचार करने से पहले, हम याचिकाकर्ता को इस अदालत के समक्ष क्लिप की प्रामाणिकता को दर्शाने वाली सामग्री दाखिल करने की अनुमति देना उचित समझते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सार्वजनिक अनुबंधों में एकतरफा मध्यस्थ नियुक्ति पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों द्वारा अनुबंधों से जुड़े विवादों में एकतरफा मध्यस्थ नियुक्त करने पर रोक लगा दी। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की प्रथा संविधान द्वारा प्रदान किए गए निष्पक्षता और समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन करती है। कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक-निजी अनुबंधों में एकतरफा मध्यस्थ नियुक्ति की शर्त संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करती है। यह फैसला पांच जजों की संविधान पीठ ने सुनाया। 
 
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झारखंड सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को झारखंड सरकार की याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया। यह याचिका झारखंड उच्च न्यायालय के उस अंतरिम आदेश के खिलाफ दायर की गई है, जिसमें कहा गया था कि राज्य में बांग्लादेश से अवैध आप्रवासियों की जांच के लिए एक फैक्ट फाइंडिंग कमिटी की जाए, जिसमें केंद्र सरकार के अधिकारी शामिल हों। 
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