सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण के लगातार खराब होते स्तर से जुड़ी याचिका पर सुनवाई के लिए 17 दिसंबर की तारीख तय की। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि वह प्रभावी आदेश जारी करेगा, जो लागू करने के योग्य होगा।
सुप्रीम कोर्ट गीतांजलि जे अंगमो की याचिका पर सुनवाई करेगा। गीतांजलि जेल में बंद जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की पत्नी हैं। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत उनकी हिरासत को सत्ता की ताकत का मनमाना इस्तेमाल बताया है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की याचिका पर भी सुनवाई करेगा। यह याचिका वरिष्ठ वकील और राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा की ओर से उनके खिलाफ दायर आपराधिक मानहानि के मामले से जुड़ी है।
सुप्रीम कोर्ट 'फालोदी हादसे के मामले' से संबंधित स्वत: संज्ञान याचिका याचिका पर सुनवाई करेगा। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट उन व्यक्तियों की सुरक्षा के लिए दिशानिर्देश बनाने के लिए विशेषज्ञ पैनल बनाने के संबंध में याचिका पर भी सुनवाई करेगा, जो ऑटिज्म से प्रभावित हैं।
मणिपुर हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती
मणिपुर में 2023 की जातीय हिंसा से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने सवाल किया कि कथित तौर पर लीक हुई ऑडियो क्लिप का पूरा हिस्सा फॉरेंसिक जांच के लिए क्यों नहीं भेजा गया। यह याचिका पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह की भूमिका को लेकर दाखिल की गई है।
न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की ओर से दाखिल हलफनामे से अदालत थोड़ी परेशान है, क्योंकि उसमें बताया गया कि केवल चुनिंदा ऑडियो क्लिप ही जांच के लिए भेजी गईं। अदालत ने पूछा कि करीब 48 मिनट की पूरी उपलब्ध रिकॉर्डिंग को गुजरात की नेशनल फॉरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी (NFSU) को क्यों नहीं भेजा गया।
वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि कुल रिकॉर्डिंग लगभग 56 मिनट की है, जिसमें से 48 मिनट अदालत में दाखिल किए गए हैं। शेष हिस्से में रिकॉर्डिंग करने वाले व्यक्ति की पहचान उजागर हो सकती है, जिससे उसकी जान को खतरा हो सकता है। इस पर अदालत ने कहा कि जब पूरी सामग्री उपलब्ध थी, तो उसे जांच के लिए भेजा जाना चाहिए था। अदालत ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है और मामले की अगली सुनवाई 7 जनवरी को तय की है। यह याचिका कुकी ऑर्गनाइजेशन फॉर ह्यूमन राइट्स ट्रस्ट ने दाखिल की है, जिसमें स्वतंत्र एसआईटी जांच की मांग की गई है।
जम्मू में CAT के लिए जगह न मिलने पर सुप्रीम कोर्ट नाराज
सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू में केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण के कामकाज के लिए उचित स्थान न मिलने पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन को एक महीने के भीतर सीएटी के लिए उपयुक्त जगह उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि जिस रफ्तार से काम हो रहा है, उससे सीएटी को स्थायी जगह मिलने में वर्षों लग सकते हैं। यह टिप्पणी 2020 में दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें सीएटी जम्मू में जगह और स्टाफ की कमी का मुद्दा उठाया गया था।
अदालत को बताया गया कि पहले एक निजी इमारत में सीएटी को स्थानांतरित करने की कोशिश हुई थी, लेकिन भवन के स्वामित्व को लेकर विवाद हो गया। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने जानकारी दी कि जम्मू विकास प्राधिकरण की एक इमारत की पहचान कर ली गई है, जहां सीएटी को अस्थायी रूप से शिफ्ट किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ तुरंत जगह देने का आदेश दिया, बल्कि तीन महीने में सीएटी के लिए स्थायी भवन के निर्माण हेतु जमीन चिन्हित करने को भी कहा है। साथ ही फरवरी के अंत तक स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने के निर्देश दिए गए हैं। अदालत ने यह भी कहा कि न्यायिक संस्थानों में आउटसोर्स स्टाफ की नियुक्ति उचित नहीं है।
2024 लोकसभा चुनाव में द्रमुक नेता दयानिधि मारन के निर्वाचन को चुनौती वाली याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने द्रमुक नेता दयानिधि मारन के चेन्नई सेंट्रल निर्वाचन क्षेत्र से 2024 लोकसभा चुनाव में चुने जाने को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। मार्च 2025 में मद्रास हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया था, जिसके बाद हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा था कि मुख्य चुनाव याचिका में दिए गए कथनों से यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता ने बिना किसी ठोस तथ्य के और मात्र अनुमानों के आधार पर कुछ खर्च को आवेदक से जुड़ा मान लिया था। इससे प्रथम दृष्टया भ्रष्टाचार साबित करने का कोई आधार नहीं बनता है। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने कहा कि उसे हाईकोर्ट कोर्ट के आदेश में दखल देने का कोई आधार नहीं दिखता। पीठ ने यह भी बताया कि चुनाव आयोग को मारन के चुनावी खर्च खातों में कोई गड़बड़ी नहीं मिली थी।
जस्टिस स्वामीनाथन के खिलाफ कथित अपमानजनक टिप्पणियों पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका
मद्रास हाईकोर्ट के जज जस्टिस जी आर स्वामीनाथन के खिलाफ कथित अपमानजनक और आपत्तिजनक टिप्पणियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई है। याचिका में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की गई है।
यह याचिका अधिवक्ता जी एस मणि ने दायर की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि डीएमके समर्थित दलों और कुछ अन्य संगठनों ने जस्टिस स्वामीनाथन के एक आदेश के बाद सार्वजनिक स्थानों और यहां तक कि मद्रास हाईकोर्ट परिसर में भी विरोध प्रदर्शन किया। याचिका के अनुसार, इन प्रदर्शनों के दौरान जज के खिलाफ जाति और धर्म के आधार पर अपमानजनक टिप्पणियां की गईं, जिससे सामाजिक सौहार्द बिगड़ने और कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब होने की आशंका पैदा हुई।
यह मामला मदुरै के थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी से जुड़ा है, जहां जस्टिस स्वामीनाथन ने 'कार्तिगई दीपम' जलाने की अनुमति दी थी। अपने आदेश में उन्होंने कहा था कि दीप जलाने से दरगाह की संरचना को कोई नुकसान नहीं होगा, क्योंकि वह स्थल से सुरक्षित दूरी पर स्थित है। जब आदेश का पालन नहीं हुआ, तो 3 दिसंबर को जज ने भक्तों को स्वयं दीप जलाने की अनुमति दी और CISF को सुरक्षा देने का निर्देश दिया। इसके बाद तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। याचिका में राज्य सरकार और पुलिस से मांग की गई है कि दोषियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जाए, ताकि न्यायपालिका की गरिमा और सामाजिक शांति बनी रहे।
ऑटिज्म पीड़ितों की सुरक्षा पर विशेषज्ञ समिति की मांग पर केंद्र से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र और अन्य को उस याचिका पर नोटिस जारी किया है जिसमें ऑटिज्म और अन्य बौद्धिक अक्षमताओं वाले लोगों की देखभाल, पुनर्वास और संरक्षण के लिए व्यापक दिशा-निर्देश बनाने के लिए एक राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति के गठन की मांग की गई है।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने गैर-सरकारी संगठन हृदय सरस फाउंडेशन और अन्य की याचिका पर केंद्र सरकार के दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग और अन्य से जवाब मांगा है। याचिका में गुहार लगाई गई है कि ऑटिज्म और अन्य बौद्धिक दिव्यांगताओं से पीड़ित लोगों के लिए देशभर में एक समान और प्रभावी नीति बनाई जाए, जिससे उनकी गरिमा, सुरक्षा और अधिकार सुनिश्चित हो सकें।
याचिका में कहा गया है कि एक राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति गठित की जाए, जिसमें ऑटिस्टिक व्यक्तियों के प्रतिनिधि, अभिभावक संगठनों के सदस्य, दिव्यांग अधिकार विशेषज्ञ और चिकित्सा पेशेवर शामिल हों। यह समिति देखभाल, पुनर्वास और संरक्षण से जुड़े व्यापक दिशा-निर्देश तैयार करे। इसके अलावा हर जिले में ऐसे व्यक्तियों के लिए आवासीय सुविधाएं स्थापित करने, उनके संचालन और निगरानी के लिए मानक संचालन प्रक्रियाएं (एसओपी) बनाने की मांग की गई है।