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Supreme Court Updates: सबरीमाला से लेकर मणिपुर हिंसा और आसाराम ट्रस्ट तक, आज इन अहम मामलों पर होगी सुनवाई

Tue, 05 May 2026 08:57 AM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को कई बड़े और संवेदनशील मामलों पर सुनवाई होनी है। नौ जजों की संविधान पीठ सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश से जुड़े 2018 के फैसले की समीक्षा करेगी। इसके अलावा शीर्ष अदालत मणिपुर जातीय हिंसा के स्पीडी ट्रायल, उन्नाव रेप केस में पूर्व भाजपा नेता कुलदीप सेंगर की जमानत के खिलाफ सीबीआई की याचिका, आसाराम ट्रस्ट के जमीन विवाद और कांग्रेस नेता शशि थरूर के मानहानि मामले पर भी अहम सुनवाई करेगी। कुछ मामलों की सुनवाई हो चुकी है, आइए सभी मामलों को विस्तार से जानते हैं...
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में हत्या के मामले में एक आरोपी को जमानत दे दी है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि बिना ट्रायल के किसी आरोपी को लंबे समय तक जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए त्वरित सुनवाई (स्पीडी ट्रायल) के मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है। कोर्ट ने कहा कि अपराध चाहे कितना भी गंभीर क्यों न हो, संवैधानिक अधिकारों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 
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क्या है पूरा मामला
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस विजय विश्नोई की पीठ ने साहिल मनोज मचारे की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। साहिल महाराष्ट्र के कोल्हापुर में दर्ज हत्या के एक मामले में 1 नवंबर 2022 से न्यायिक हिरासत में था। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि लगभग चार साल से जेल में बंद रहने और 2024 में आरोप तय होने के बावजूद अब तक ट्रायल कोर्ट में एक भी गवाह से पूछताछ नहीं की गई है। 

बॉम्बे हाईकोर्ट ने खारिज की थी जमानत याचिका?
इससे पहले मार्च 2026 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपराध की गंभीरता और प्रथम दृष्टया सबूतों का हवाला देते हुए जमानत याचिका खारिज कर दी थी। पुलिस ने कोल्हापुर के शाहपुर थाने में आईपीसी की धारा 302 और 34 के तहत यह केस दर्ज किया था। आरोपी की दलील थी कि एफआईआर में उसका नाम नहीं था और उससे कोई हथियार भी बरामद नहीं हुआ है। मामले की सुस्ती को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और निचली अदालत की शर्तों पर आरोपी को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया है।
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पीआईएल बनी पैसा हित याचिका यह कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग
जनहित याचिकाओं के बढ़ते दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अब पीआईएल का स्वरूप बदलकर केवल पैसा हित, प्राइवेट हित, प्रचार हित और पॉलिटिकल हित याचिका हो गया है। यह कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की नौ सदस्यीय संविधान पीठ सबरीमला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को चुनौती वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

पीठ ने इस मामले में इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन की 2006 की जनहित याचिका पर पूछा कि क्या आप देश के मुख्य पुजारी हैं? पीठ के समक्ष इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन की ओर से पेश हुए अधिवक्ता रवि प्रकाश गुप्ता ने बताया कि जून 2006 में अखबार में चार लेख प्रकाशित हुए थे और जनहित याचिका उन्हीं पर आधारित है। उन्होंने तर्क दिया कि एसोसिएशन भगवान अयप्पा के भक्तों की आस्था को चुनौती नहीं दे रहा है, बल्कि उसका समर्थन कर रहा है। इस पर सीजेआई ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा, ऐसी याचिका को तो सीधे खारिज कर देना चाहिए था। सिर्फ अखबार में छपे लेख के आधार पर जनहित याचिका दायर करने का क्या आधार बनता है? आजकल जनहित याचिका दाखिल करने के लिए लेख लिखवाना आसान हो गया है। सीजेआई ने पूछा, आपने यह पीआईएल क्यों दायर की है? क्या आप देश के मुख्य पुजारी हैं?’’ इस पर वकील ने जवाब दिया कि उनकी संस्था एक पंजीकृत संस्था है।

निष्क्रिय खातों पर आरबीआई का दावा-उद्गम पोर्टल से 44 लाख से ज्यादा हुई पूछताछ
भारतीय रिजर्व बैंक ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि ‘अनक्लेम्ड डिपॉजिट्स-गेटवे टू एक्सेस इन्फॉर्मेशन’ (उद्गम) पोर्टल पंजीकृत उपयोगकर्ताओं को कई बैंकों में बिना दावे वाली जमा राशि की खोज करने की सुविधा प्रदान करता है। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ पत्रकार सुचेता दलाल की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में मृत जमाकर्ताओं के कानूनी वारिसों को बैंक खातों में निष्क्रिय पड़े बिना दावे वाली जमा राशि के बारे में सूचित करने के लिए एक तंत्र स्थापित करने का निर्देश देने की मांग की गई। आरबीआई के वकील ने पीठ को बताया कि उद्गम पर लगभग 44 लाख सर्च किए जा चुके हैं।

याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि मुद्दा यह है कि मृतक जमाकर्ताओं के वारिसों को डाकघर, बैंक खातों में पड़े लावारिस जमाओं के बारे में कैसे पता चलेगा। केंद्र के वकील ने पीठ को बताया कि उन्होंने एक अपडेट हलफनामा तैयार कर लिया है जिसे अदालत में दाखिल किया जाएगा। पीठ ने केंद्र को प्रासंगिक विवरणों समेत अपडेट हलफनामा एक सप्ताह के भीतर दाखिल करने को कहा और मामले की सुनवाई 19 मई को तय की।

अंतरधार्मिक विवाह करने पर पारसी महिलाओं का बहिष्कार भेदभावपूर्ण
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अंतरधार्मिक विवाह करने पर पारसी महिलाओं का बहिष्कार करना प्रथमदृष्ट्या भेदभावपूर्ण है। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 (1) के तहत अंतरात्मा का अधिकार जन्मजात अधिकार है और विवाह से इसे छीना नहीं जा सकता।संविधान पीठ इस प्रश्न की भी जांच कर रही है कि क्या किसी समुदाय के धार्मिक प्रमुख की किसी सदस्य को धार्मिक जीवन से निष्कासित करने की शक्ति, अनुच्छेद 25 के तहत व्यक्ति के धर्म का पालन करने और उसका अभ्यास करने के अधिकार के साथ-साथ चल सकती है। सुनवाई के दौरान, एक हिंदू पुरुष से शादी करने और अंतरधार्मिक विवाह के कारण पारसी समुदाय से बहिष्कृत हुई पारसी महिला के वकील डेरियस खंबाटा ने कहा कि ऐसा करना कानून की दृष्टि से गलत है। उन्होंने कहा, मैं एक भक्त हूं, मैंने अपना धर्म नहीं छोड़ा है, मैं एक आस्तिक हूं। सिर्फ इसलिए कि मैंने शादी की है (मुझे बहिष्कृत किया गया है), यह (अंतरधार्मिक विवाह) कोई अपराध नहीं है।
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