सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के थझम्बूर में वर्षों से लंबित जमीन विवाद को सुलझाते हुए यथास्थिति का आदेश हटा दिया है। वहीं, सुजान सिंह मामले में अदालत ने हाईकोर्ट का फैसला पलट दिया। आइए, सुप्रीम कोर्ट के कई मामलों को इस रिपोर्ट में जानेंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को तमिलनाडु के थझम्बूर गांव में जमीनी सौदों से जुड़े एक लंबे कानूनी विवाद को खत्म करते हुए हजारों घर खरीदारों को बड़ी राहत दी है। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने उस पुराने यथास्थिति आदेश को हटा दिया है, जिसकी वजह से आम नागरिक वर्षों से परेशान थे। अदालत ने तमिलनाडु सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि एक जन कल्याणकारी राज्य दशकों पुराने लेन-देन को आज रद्द करने की कोशिश नहीं कर सकता, खासकर तब जब इसमें निर्दोष नागरिकों की गाढ़ी कमाई लगी हो। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकार वक्त का पहिया पीछे नहीं घुमा सकती और अपनी प्रशासनिक देरी की सजा उन लोगों को नहीं दे सकती जिन्होंने अपने सिर पर छत की उम्मीद में निवेश किया है।
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यह विवाद कांचीपुरम जिले के थझम्बूर में स्वतंत्रता सेनानियों और निजी व्यक्तियों को किए गए कथित अवैध भूमि आवंटन से शुरू हुआ था। साल 2019 से लागू यथास्थिति के आदेश के कारण सैकड़ों लोग अपनी संपत्तियों का पंजीकरण नहीं करा पा रहे थे और उन्हें पानी व सीवर जैसी बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि राज्य सरकार जांच के नाम पर मामले को केवल लटका रही है। अदालत ने अब सरकार को आदेश दिया है कि वह एक सर्वे नंबर के 450 फ्लैटों को तुरंत पानी और सीवर कनेक्शन प्रदान करे। साथ ही, पूर्व जज के. पी. शिवसुब्रमण्यम की कमेटी को चार महीने में रिपोर्ट सौंपने और राज्य कैबिनेट को उसके बाद दो महीने में अंतिम फैसला लेने का निर्देश दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला पलटा, केंद्र सरकार को बड़ी राहत
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें केंद्र सरकार को राजधानी के पॉश इलाके सुजन सिंह पार्क में स्थित आवासीय परिसरों को खाली करने के लिए कहा गया था। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्र की बेंच ने स्पष्ट किया कि सुजन सिंह पार्क में केंद्र सरकार का कब्जा दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट के दायरे में नहीं आता है। अदालत ने माना कि यह मामला साल 1945 के एक सरकारी अनुदान के नियमों से नियंत्रित होता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट, 1958 के मुकाबले गवर्नमेंट ग्रांट्स एक्ट, 1895 की सर्वोच्चता को बरकरार रखा और कहा कि हाई कोर्ट ने इस मामले में अधिकार क्षेत्र को समझने में गलती की थी।
यह विवाद साल 1945 के एक लीज डीड से जुड़ा है, जो सर सोभा सिंह एंड संस प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में किया गया था। इस लीज के तहत सरकार ने 50 प्रतिशत फ्लैटों को अपने अधिकारियों के लिए उचित किराए पर रखने का अधिकार सुरक्षित रखा था। साल 1991 में, सर सोभा सिंह एंड संस ने केंद्र सरकार के खिलाफ किराया न देने का आरोप लगाते हुए बेदखली की याचिका दायर की थी। निचली अदालतों और फिर 2020 में दिल्ली हाई कोर्ट ने सरकार के खिलाफ फैसला सुनाया था। हालांकि, अब सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि चूंकि यह रिश्ता मकान मालिक और किराएदार जैसा पारंपरिक नहीं बल्कि एक संप्रभु सरकारी व्यवस्था है, इसलिए बेदखली की कार्यवाही कानूनी रूप से गलत थी। अदालत ने कहा कि लीज डीड में किराया न देने पर बेदखली का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था, इसलिए सरकार को वहां से हटाया नहीं जा सकता।
दाऊदी बोहरा समुदाय में बहिष्कार की प्रथा सांविधानिक अधिकार- सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट में दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़े बहिष्कार के अधिकार को लेकर सुनवाई के दौरान समुदाय की ओर से कहा गया कि यह प्रथा संविधान के तहत संरक्षित है और ‘सांविधानिक नैतिकता’ के आधार पर इसे सीमित नहीं किया जा सकता।
सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की नौ सदस्यीय संविधान पीठ इस अहम सवाल पर विचार कर रही है कि क्या किसी धार्मिक प्रमुख को समुदाय के सदस्य को धार्मिक जीवन से बाहर करने का अधिकार, संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता के साथ सह-अस्तित्व में रह सकता है।
समुदाय की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि हर धर्म की अपनी अलग नैतिकता होती है, जो सदियों में विकसित हुई है। उन्होंने कहा, जो एक के लिए नैतिक है, वह दूसरे के लिए जरूरी नहीं कि नैतिक हो। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि दिगंबर जैन साधुओं या नागा साधुओं की कुछ परंपराएं आम सामाजिक मानकों से अलग हो सकती हैं, लेकिन वे उनके धार्मिक आचरण का हिस्सा हैं। इसी तरह, अलग-अलग धर्मों में खान-पान और पहनावे के नियम भी भिन्न होते हैं, जिन्हें सामान्य नैतिकता के आधार पर नहीं आंका जा सकता।
रोहतगी ने कहा, संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 में नैतिकता पहले से ही एक सीमा के रूप में मौजूद है, ऐसे में सांविधानिक नैतिकता को अतिरिक्त आधार बनाना इन अधिकारों को कमजोर कर सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि नैतिकता को धर्म के संदर्भ में ही समझा जाना चाहिए, न कि व्यापक सामाजिक मानकों से। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल ने भी समुदाय के धार्मिक प्रमुख की ओर से संक्षिप्त दलीलें पेश कीं। यह मामला 1962 के बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें बहिष्कार की प्रथा को धार्मिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई थी। इस फैसले को चुनौती दिए जाने के बाद मामला संविधान पीठ को भेजा गया है।