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SC: पूर्व आईपीएस संजीव भट्ट की जमानत याचिका खारिज; वक्फ कानून के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई से इनकार

Tue, 29 Apr 2025 12:27 PM IST
नितिन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई (फाइल)
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को साल 1990 में हिरासत में मौत मामले में पूर्व आईपीएस संजीव भट्ट की जमानत याचिका खारिज कर दी। इस मामले में पूर्व आईपीएस को उम्रकैद की सजा हुई है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि 'इस याचिका की कोई मेरिट नहीं है। ऐसे में हम संजीव भट्ट की जमानत मंजूर नहीं कर रहे हैं। याचिका खारिज की जाती है।' याचिका में संजीव भट्ट ने अपनी सजा और दोषसिद्धि को चुनौती दी थी। इससे पहले गुजरात उच्च न्यायालय ने भी साल 2024 में संजीव भट्ट की याचिका खारिज कर दी थी और दोषसिद्धि को बरकरार रखा था। 
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30 अक्तूबर 1990 में जमजोधपुर शहर में हुए सांप्रदायिक दंगे के मामले में 150 लोगों को हिरासत में लिया था। ये लोग भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा रोके जाने का विरोध कर रहे थे। इन्हीं में से एक प्रभुदास वैषनानी नामक व्यक्ति की रिहाई के बाद अस्पताल में मौत हो गई थी। वैषनानी के भाई ने संजीव भट्ट और छह अन्य पुलिस अधिकारियों पर उसके भाई को हिरासत में प्रताड़ित करने का आरोप लगाया था। 5 सितंबर 2018 को संजीव भट्ट की गिरफ्तारी हुई थी।
 

वक्फ कानून के खिलाफ दायर याचिकाएं खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ कानून की वैधता को चुनौती देने वाली 13 और याचिकाओं पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि वे और याचिकाएं शामिल नहीं करेंगे क्योंकि फिर इन्हें नियंत्रित करना मुश्किल हो जाएगा। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने बताया कि वे पहले से ही इस मामले में कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं फिरोज इकबाल खान, इमरान प्रतापगढ़ी, शाइक मुनीर अहमद और मुस्लिम एडवोकेट एसोसिएशन से कहा कि अगर उनके पास कानून को चुनौती देने के लिए अतिरिक्त तथ्य हैं तो वे मुख्य याचिकाओं में दखल दे सकते हैं। अभी सर्वोच्च अदालत एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमीयत उलेमा ए हिंद, डीएमके, कर्नाटक वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष अनवर बाशा, इमरान प्रतापगढ़ी और मोहम्मद जावेद की वक्फ कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। 
 

निठारी हत्याकांड: सुरेंद्र कोली से जुड़े मामले पर 30 जुलाई को सुनवाई
उच्चतम न्यायालय ने 2006 के निठारी हत्याकांड मामले में सुरेंद्र कोली को बरी किए जाने को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के लिए मंगलवार को 30 जुलाई की तारीख तय की। ये अपीलें न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आईं। याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुए वकील ने इस मामले को एक जघन्य अपराध बताया, जिसमें कई बच्चों के कंकाल मिले थे।

वहीं सुरेंद्र कोली की ओर से पेश हुए वकील ने कहा कि यह बिना किसी चश्मदीद के परिस्थितिजन्य साक्ष्य का मामला है। मामले में दलीलें पेश करने के लिए समय के बारे में वकीलों से पूछने पर पीठ ने कहा, 'यह (बहस) आज समाप्त होने की संभावना नहीं है।' साथ ही, इसने मामले को 30 जुलाई के लिए निर्धारित कर दिया। शीर्ष अदालत ने पिछले साल केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) और उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से दायर याचिकाओं समेत अलग-अलग याचिकाओं की जांच करने पर सहमति व्यक्त की थी। इन याचिकाओं में, 16 अक्तूबर 2023 को कोली को बरी करने के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी गई थी। इनमें से एक याचिका एक पीड़ित के पिता ने उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए दायर की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- क्या शरजील पर एक ही भाषण के लिए कई राज्यों में मुकदमा चल सकता है?

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पूछा कि क्या जेएनयू के पूर्व छात्र शरजील इमाम पर एक ही भाषण के लिए देशद्रोह समेत अन्य अपराधों के लिए अलग-अलग राज्यों में मुकदमा चलाया जा सकता है। शीर्ष अदालत नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान दिए गए कथित भड़काऊ भाषण के लिए चार राज्यों, उत्तर प्रदेश, असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में उनके खिलाफ दर्ज कई एफआईआर को एक साथ जोड़ने की मांग करने वाली इमाम की 2020 की याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने आग्रह किया कि एक भाषण के लिए देश भर में कई मुकदमों का सामना नहीं करना पड़ सकता। दिल्ली पुलिस की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू, जिन्होंने इमाम के खिलाफ आपराधिक मामला भी दर्ज किया है, ने दलीलों का विरोध किया और कहा, 'उन्होंने बिहार में भीड़ को उकसाया, उत्तर प्रदेश में भीड़ को उकसाया और दिल्ली में। अपराध अलग-अलग हैं।' सीजेआई ने कहा, 'लेकिन भाषण एक ही है। अगर भाषण यूट्यूब आदि पर है और फिर इसे पूरे भारत में सुना जा सकता है तो इसका प्रभाव एक ही होगा।' उन्होंने इसे दोहरे खतरे का मामला बताया। सीजेआई ने कहा कि मामलों को दिल्ली स्थानांतरित किया जाना चाहिए। राजू ने कहा कि वह अन्य राज्यों का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे हैं और इसलिए उनके पास मामलों को क्लब करने या स्थानांतरित करने के निर्देश नहीं हैं।
 

सुप्रीम कोर्ट से TTJ के सदस्यों को राहत
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु तौहीद जमात के दो सदस्यों के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया है, जिन पर संसद हमले के दोषी अफजल गुरु की प्रशंसा करने के अलावा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कपड़ों पर टिप्पणी करने और सुप्रीम कोर्ट व उच्च न्यायालय के जजों के खिलाफ असंसदीय भाषा का इस्तेमाल करने का आरोप है।

22 अप्रैल को अपने फैसले में जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने कर्नाटक और तमिलनाडु में उनके खिलाफ दर्ज तीन एफआईआर को एक साथ जोड़ दिया और कहा कि रहमतुल्ला और जमाल मोहम्मद ने 17 मार्च, 2022 को मदुरै में एक विरोध रैली में "अत्यधिक आपत्तिजनक" नफरत भरे भाषण दिए। पीठ ने कहा, "हमें ध्यान देना चाहिए कि याचिकाकर्ताओं द्वारा अपने भाषणों में इस्तेमाल की गई भाषा अत्यधिक आपत्तिजनक है और निश्चित रूप से कथित अपराधों के आवश्यक तत्वों का खुलासा करती है। इसलिए, इस न्यायालय के पास संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत रिट अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने की कोई गुंजाइश नहीं है, ताकि आरोपित एफआईआर को रद्द किया जा सके।" 

सुप्रीम कोर्ट ने उपभोक्ता कानून के प्रावधानों की वैधता को बरकरार रखा
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, जिसमें जिला, राज्य और राष्ट्रीय आयोगों के वित्तीय अधिकार क्षेत्र को वस्तुओं और सेवाओं के लिए भुगतान किए गए प्रतिफल के आधार पर निर्धारित किया गया है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 में वित्तीय अधिकार क्षेत्र के प्रतिबंध में दावों के मौद्रिक मूल्य को परिभाषित किया गया है, जिसे उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (जिला, राज्य और राष्ट्रीय) का प्रत्येक फोरम निपटा सकता है।

न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 34(1), 47(1)(ए)(आई) और 58(1)(ए)(आई) को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें मुआवजे के बजाय भुगतान की गई वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य के आधार पर जिला, राज्य और राष्ट्रीय आयोगों के आर्थिक अधिकार क्षेत्र निर्धारित किए गए थे, और कहा कि वे संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं करते हैं। 
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सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट की जमानत याचिका खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को 1990 में हिरासत में हुई मौत के मामले में दोषी पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट की जमानत याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।  न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि इस मामले में जमानत या सजा के निलंबन के लिए उनकी याचिका में कोई दम नहीं है।

न्यायमूर्ति नाथ ने फैसला सुनाते हुए कहा, 'हम संजीव भट्ट को जमानत देने के पक्ष में नहीं हैं। जमानत की प्रार्थना खारिज की जाती है। अपील की सुनवाई प्रभावित नहीं होगी। अपील की सुनवाई में तेजी लाई जा रही है।' पीठ ने यह भी कहा कि जमानत पर आदेश का शीर्ष अदालत के समक्ष लंबित अपील की योग्यता पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
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