1,000 करोड़ का पर्यावरण राहत कोष कठघरे में, सुप्रीम कोर्ट ने मांगा पूरा हिसाब
पर्यावरणीय और औद्योगिक हादसों के पीड़ितों को तत्काल आर्थिक मदद देने के लिए बनाया गया करीब 1,000 करोड़ रुपये का पर्यावरण राहत कोष सवालों के घेरे में आ गया है। वर्ष 2021 तक इसमें 1,000.69 करोड़ रुपये जमा हो चुके थे, लेकिन यह पैसा कहां और कितना खर्च हुआ तथा पीड़ितों तक कितनी राहत पहुंची, इसका स्पष्ट ब्योरा सामने नहीं आने पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) से पूरा हिसाब मांगा है।
केंद्र और सीपीसीबी से विस्तृत हलफनामा तलब
डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने 21 जुलाई को केंद्र और सीपीसीबी को विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत ने यह स्पष्ट करने को कहा है कि कोष में वर्तमान में कितनी रकम है, अब तक कितनी राशि खर्च की गई और इसके इस्तेमाल के लिए क्या व्यवस्था बनाई गई है। सुनवाई के दौरान केंद्र ने अदालत को बताया कि वर्ष 2021 तक पर्यावरण राहत कोष में करीब 1,000.69 करोड़ रुपये जमा थे। इसके बाद कोष में कितनी रकम जमा हुई और वर्तमान में कुल राशि कितनी है, इसका स्पष्ट आंकड़ा अदालत के सामने नहीं रखा जा सका। इसी के साथ कोष के वास्तविक इस्तेमाल को लेकर भी स्थिति साफ नहीं हो सकी।
पीड़ितों को राहत देने का स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं
पर्यावरण राहत कोष लोक दायित्व बीमा अधिनियम, 1991 के तहत बनाया गया है। इसका उद्देश्य खतरनाक पदार्थों से जुड़े औद्योगिक या पर्यावरणीय हादसों के शिकार लोगों को जल्द आर्थिक राहत उपलब्ध कराना है। कोष के संचालन के लिए वर्ष 2008 में पर्यावरण राहत कोष योजना बनाई गई थी।इसके बावजूद अदालत के सामने उपलब्ध रिकॉर्ड से यह स्पष्ट नहीं हुआ कि इस योजना के तहत जरूरतमंदों और हादसा पीड़ितों को वास्तव में कितनी रकम वितरित की गई। सुप्रीम कोर्ट ने इसी पर सवाल उठाते हुए जानना चाहा है कि सीपीसीबी के पास मौजूद कोष का उसके मूल उद्देश्य के लिए कितना इस्तेमाल हुआ।
पीड़ितों के लिए पैसा, फिर वर्षों से पड़ा क्यों?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने सार्वजनिक उद्देश्य के लिए जमा इतनी बड़ी रकम के इस्तेमाल की स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।अदालत की चिंता यह है कि जिस धन को पर्यावरणीय और औद्योगिक दुर्घटनाओं के पीड़ितों को तत्काल राहत देने के लिए जुटाया गया, वह लंबे समय तक निष्क्रिय क्यों पड़ा रहा।
अब बताना होगा,कितना आया, कितना खर्च हुआ
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद केंद्र और सीपीसीबी को अब कोष की मौजूदा राशि, उसके उपयोग और राहत वितरण का दस्तावेजी हिसाब देना होगा। इससे यह भी साफ होगा कि करीब एक हजार करोड़ रुपए के इस कोष से वास्तविक लाभार्थियों तक कितनी मदद पहुंची। मामला केवल सरकारी धन के हिसाब-किताब का नहीं है, बल्कि उन हादसा पीड़ितों के हक का भी है जिनकी तत्काल सहायता के लिए यह कोष बनाया गया था।