सुधार की संभावना को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्म के दोषी की सजा घटाई, उम्रकैद की जगह 20 साल की जेल
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को वर्ष 2016 के सामूहिक दुष्कर्म मामले में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की सजा प्राकृतिक जीवन के शेष हिस्से तक के कठोर कारावास से घटाकर 20 वर्ष कर दी। अदालत ने कहा कि अपराध के समय दोषी की उम्र केवल 25 वर्ष थी और उसके सुधार की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि दोषी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और जेल में उसका आचरण भी अच्छा रहा है।
पीठ ने कहा, "इस मामले में दोषी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। अपराध के समय उसकी उम्र केवल 25 वर्ष थी। कम उम्र होने के कारण उसके सुधार की संभावना है।" अदालत ने कहा, "राज्य सरकार ने ऐसा कोई रिकॉर्ड पेश नहीं किया है जिससे यह साबित हो कि उसका सुधार संभव नहीं है। न ही उसने दोषी की ओर से किए गए इस दावे का खंडन किया है कि लगभग 10 वर्षों (रिमिशन सहित) के दौरान जेल में उसका आचरण अच्छा रहा है।"
पीठ ने सुनवाई के दौरान की क्या टिप्पणी?
निचली अदालत ने दोषी को जीवन के शेष प्राकृतिक काल तक कठोर कारावास की सजा सुनाई थी और पीड़िता को 25 हजार रुपये जुर्माना देने का भी आदेश दिया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकता कि यह जघन्य अपराध है, जो केवल पीड़िता ही नहीं बल्कि पूरे समाज के खिलाफ है। पीठ ने कहा, "सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर पितृसत्तात्मक सोच से बाहर निकलने की दिशा में काफी बदलाव आने के बावजूद ऐसी घटनाएं बिना किसी झिझक के लगातार हो रही हैं।"
अदालत ने कहा कि समय-समय पर कानून में कई संशोधन किए गए हैं। इनका कुछ सकारात्मक असर भी पड़ा है, लेकिन जब तक ऐसी घटनाएं केवल इतिहास का हिस्सा नहीं बन जातीं और समाज उन्हें पूरी तरह अस्वीकार नहीं करता, तब तक ऐसे अपराधों को खत्म करने की जरूरत कम नहीं आंकी जा सकती। पीठ ने न्यायमूर्ति के. रामास्वामी की टिप्पणी का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था, "सजा तय करने की प्रक्रिया में जहां सख्ती जरूरी हो, वहां सख्त रहें और जहां दया की गुंजाइश हो, वहां दया भी बरती जानी चाहिए।"
क्या सेवानिवृत्त जजों के लिए 45 व 50 हजार में ड्राइवर-सुरक्षाकर्मी रखना संभव
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार से कहा कि हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीशों और न्यायाधीशों को मिलने वाली सुविधाओं के लिए पूरे देश में एक समान नीति बनाई जाए। अदालत ने कहा कि अलग-अलग राज्यों में मिलने वाली सुविधाओं में बड़ा अंतर है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि केंद्र दो सप्ताह के भीतर एक समिति गठित करे। यह समिति तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपे। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने पूछा कि 45 से 50 हजार रुपये में क्या एक ड्राइवर और सुरक्षाकर्मी रखना संभव है। राज्यों में सुविधाओं की कोई समान व्यवस्था नहीं है। अगर केंद्र समिति नहीं बनाएगा तो अदालत खुद समिति गठित करने पर विचार करेगी। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि सरकार को समिति बनाने में कोई दिक्कत नहीं है और इस मुद्दे का समाधान किया जाएगा।
हर राज्य में अलग-अलग सुविधाएं
यह मामला सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के संगठन के अध्यक्ष जस्टिस वीएस दवे की अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि घरेलू सहायक, ड्राइवर, टेलीफोन, चिकित्सा खर्च की प्रतिपूर्ति और यात्रा के दौरान सरकारी आवास जैसी सुविधाएं हर राज्य में अलग-अलग हैं। इसलिए एक समान राष्ट्रीय नीति की जरूरत है। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि इस व्यवस्था में राज्यों के साथ खर्च साझा करने के कारण केंद्र की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।