उत्तर प्रदेश के पूर्व विधायक और समाजवादी पार्टी (SP) के नेता आजम खान के बेटे को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली है। शीर्ष अदालत में जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने मोहम्मद अब्दुल्ला आजम खान की अपील ठुकराते हुए कहा, हमें इलाहाबाद हाई कोर्ट के 23 जुलाई के आदेश में हस्तक्षेप का कोई कारण नजर नहीं आता। अब्दुल्ला ने पासपोर्ट बनाने के लिए कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज इस्तेमाल करने के आरोप वाले मामले में कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी। दलीलों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जब ट्रायल अंतिम चरण में है, तो अब दखल का कोई औचित्य नहीं है। सपा नेता आजम खान के बेटे अब्दुल्ला के खिलाफ 2019 में FIR दर्ज कराई गई थी। अब्दुल्ला पर आरोप है कि उन्होंने शैक्षिक अभिलेखों में अपनी जन्मतिथि 1 जनवरी 1993 दिखाई है, जबकि पासपोर्ट में जन्मतिथि 30 सितंबर, 1990 दर्ज कराई। उन पर धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज के उपयोग के अलावा पासपोर्ट अधिनियम की धारा 12(1A) के तहत आरोपपत्र दायर हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि ट्रायल कोर्ट सभी मुद्दों पर स्वतंत्र रूप से निर्णय लेगा।
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देश में खराब वायु गुणवत्ता का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा
दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण को लेकर एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। वेलनेस एक्सपर्ट ल्यूक क्रिस्टोफर कोटिन्हो ने 24 अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल इस याचिका में कहा, देश में बढ़ते वायु प्रदूषण को रोकने में सिस्टम लगातार नाकाम हुआ है। हालात 'जन स्वास्थ्य आपातकाल' स्तर पर पहुंचने का जिक्र करते हुए याचिकाकर्ता ने केंद्र सरकार, CPCB, CAQM, कई केंद्रीय मंत्रालयों, नीति आयोग तथा दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र की सरकारों को पक्षकार बनाया है। याचिका में कहा गया है कि वायु प्रदूषण के कारण नागरिकों के जीवन और स्वास्थ्य के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) का हनन हो रहा है। मौजूदा हालात को राष्ट्रीय जन स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करने की अपील करते हुए कोटिन्हो ने कहा कि इस हालात से निपटने के लिए एक समयबद्ध राष्ट्रीय कार्ययोजना बनाए जाने की भी जरूरत है। उन्होंने अदालत को बताया कि साल 2019 में शुरू किए गए राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) लक्ष्यों को भी हासिल नहीं किया जा सका है। 2024 तक हवा में पीएम 10 कणों को 20 से 30 फीसदी कम करने का लक्ष्य रखा गया था। 2026 तक इस लक्ष्य को बढ़ाकर 40% किया गया। हालांकि, जुलाई 2025 तक 130 में से केवल 25 शहरों में ही आधार वर्ष 2017 की तुलना में PM10 का स्तर 40% कम किया जा सका। 25 शहरों में प्रदूषण और बढ़ गया। याचिकाकर्ता ने कहा है कि कोलकाता, लखनऊ सहित कई शहरों में मानकों का उल्लंघन भी किया गया है।
हिंदू संगठन सुप्रीम कोर्ट पहुंचा- धर्म परिवर्तन से संबंधित याचिकाओं में हस्तक्षेप की अपील
अखिल भारतीय संत समिति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। गुरुवार को दायर याचिका में समिति ने उन मामलों में हस्तक्षेप की अनुमति मांगी है, जिनमें कई राज्यों के जबरन और अवैध धर्मांतरण रोकने संबंधी कानूनों को चुनौती दी गई है। समिति ने उत्तराखंड फ्रीडम ऑफ रिलीजन एक्ट 2018, उत्तर प्रदेश अवैध धर्मांतरण निषेध अधिनियम 2021, हिमाचल प्रदेश फ्रीडम ऑफ रिलीजन एक्ट 2019 और मध्य प्रदेश फ्रीडम ऑफ रिलीजन एक्ट 2021 के खिलाफ दायर याचिकाओं में खुद को पक्षकार बनाए जाने की मांग की है। सितंबर में सुप्रीम कोर्ट ने अंतर-धार्मिक विवाहों के दौरान होने वाले धर्मांतरण को नियंत्रित करने वाले इन विवादित कानूनों को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं को उच्च न्यायालयों से अपने पास स्थानांतरित कर लिया था। समिति ने तर्क दिया कि संविधान से मिले 'प्रचार' का अधिकार किसी को जबरन धर्मांतरण करने का अधिकार नहीं देता। उसका कहना है कि ये कानून स्वैच्छिक धर्मांतरण पर रोक नहीं लगाते, बल्कि केवल उन मामलों को नियंत्रित करते हैं जो बल, धोखे, प्रलोभन, दबाव या फर्जी विवाह के आधार पर किए जाते हैं।
कई जातियों का ओबीसी दर्जा रद्द करने पर कोई कार्यवाही नहीं करेगा कलकत्ता हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को निर्देश दिया कि पश्चिम बंगाल में कई जातियों का ओबीसी दर्जा रद्द करने से संबंधित मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट आगे कोई कार्यवाही नहीं होगी। शीर्ष कोर्ट पश्चिम बंगाल सरकार की तरफ से दायर एक याचिका सहित 10 याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था।
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं में कलकत्ता हाईकोर्ट के 22 मई, 2024 के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिनमें 2010 से पश्चिम बंगाल में कई जातियों को दिए गए ओबीसी दर्जे को रद्द कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (एससी/एसटी से इतर) (सेवाओं और पदों में रिक्तियों का आरक्षण) अधिनियम, 2012 के तहत ओबीसी के तौर पर वर्गीकृत 37 वर्गों के अलावा अप्रैल, 2010 और सितंबर, 2010 के बीच दिए गए 77 आरक्षण वर्गों को रद्द कर दिया था।
देश के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस के विनोद चंद्रन और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की इस दलील पर ध्यान दिया कि उच्च न्यायालय ने याचिकाओं पर सुनवाई के लिए 18 नवंबर की तारीख तय की है। सीजेआई ने कहा, जब सर्वोच्च न्यायालय इस मामले पर विचार कर रहा है, तो उच्च न्यायालय इस मामले को कैसे आगे बढ़ा सकता है।
जस्टिस गवई ने कहा, हम स्पष्ट करते हैं कि जब तक अगला आदेश पारित नहीं हो जाता, कलकत्ता हाईकोर्ट में आगे कोई कार्यवाही नहीं होगी। उन्होंने याचिकाओं की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद निर्धारित की है। इससे पहले, 18 मार्च को पश्चिम बंगाल सरकार ने शीर्ष कोर्ट को सूचित किया था कि राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग पिछड़ेपन के मुद्दे की नए सिरे से जांच कर रहा है और यह प्रक्रिया तीन महीने के भीतर पूरी होने की उम्मीद है।
अमित जोगी की बरी पर फिर विचार करेगा हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट ने CBI की अर्जी मंजूर की
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वह एनसीपी नेता रामअवतार जग्गी हत्याकांड में अमित जोगी की बरी के खिलाफ सीबीआई की अर्जी पर दोबारा विचार करे। जग्गी की हत्या 4 जून 2003 को उस समय हुई थी, जब अजीत जोगी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री थे।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच में जस्टिस विक्रम नाथ, संजय करोल और संदीप मेहता शामिल थे। बेंच ने कहा कि सीबीआई की अपील दाखिल करने में 1,373 दिन की देरी हुई, लेकिन आरोप बेहद गंभीर हैं। अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट को सीबीआई की अर्जी पर उदार और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए था।
बेंच ने कहा, “हम सीबीआई की देरी के कारण को स्वीकार नहीं कर रहे हैं, लेकिन इतने गंभीर आरोपों वाले मामले को केवल तकनीकी कारणों से खारिज नहीं किया जाना चाहिए।” यह मामला पहले राज्य पुलिस ने जांचा था, बाद में सीबीआई को सौंपा गया। 2007 में ट्रायल कोर्ट ने 28 आरोपियों को दोषी पाया, लेकिन अमित जोगी को बरी कर दिया था। हाईकोर्ट ने उस समय सीबीआई और रामअवतार जग्गी के बेटे सतीश जग्गी की याचिकाएं भी खारिज कर दी थीं। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश से इस मामले की कानूनी समीक्षा फिर शुरू होगी।