सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को दो याचिकाकर्ताओं से कहा कि वे विधि आयोग के पास जाएं। इन याचिकाकर्ताओं ने 1882 के कानून के एक प्रावधान को चुनौती दी थी, जिसमें मुस्लिम कानून के तहत किए गए तोहफों (उपहार) को पंजीकरण से मुक्त रखा गया है।
मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के लिए उचित यह होगा कि वे विधि आयोग जैसे विशेषज्ञ निकाय के पास जाएं। विधि आयोग को मौजूदा कानूनों में उचित संशोधन की सिफारिश करने या नए कानून बनाने की जिम्मेदारी दी गई है।
याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि याचिका ने संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 की धारा 129 और मुस्लिम व्यक्तिगत कानून (शरिया) आवेदन अधिनियम, 1937 की धारा 2 की सांविधानिक वैधता को चुनौती दी है, विशेष रूप से 'तोहफा' शब्द को लेकर।
वकील ने कहा कि मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के तहत किए गए तोहफों को स्टाम्प शुल्क से मुक्त किया गया है, जबकि गैर-मुसलमानों को यह छूट नहीं दी गई। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली भी शामिल थे। उन्होंने कहा कि यदि सार्वजनिक खजाने को कोई नुकसान होता है, तो संसद ही इसके लिए सक्षम मंच है। पीठ ने कहा कि संसद हमेशा कानून में संशोधन कर सकती है और नया कानून ला सकती है।
सीजेआई ने पूछा कि याचिकाकर्ताओं ने संसद के किसी सदस्य के पास यह मुद्दा क्यों नहीं उठाया कि कानून में कथित भेदभाव का तत्व मौजूद है। वकील ने कहा कि संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम और पंजीकरण अधिनियम के बीच संबंध है। उन्होंने कहा कि तोहफे की अवधारणा को लेकर व्यक्तिगत कानून और मौलिक अधिकारों के बीच टकराव पर निर्णय इस अदालत को करना है। पीठ ने कहा कि यह कानून 1882 का है। अचानक 2026 में आपको याद आता है कि यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है और जब आपको यह याद आता है, तब आपने उन लोगों को सूचित करना भी उचित नहीं समझा जो इसे ठीक कर सकते थे। सीजेआई ने कहा कि 'सबसे उचित मंच' विधि आयोग होगा।
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पीठ ने कहा, हमारे विचार में याचिकाकर्ताओं के लिए उचित तरीका यह होगा कि वे विधि आयोग जैसे विशेषज्ञ निकाय के पास जाएं, जिसे मौजूदा कानूनों में संशोधन की सिफारिश करने और समय-समय पर नए कानून बनाने की जिम्मेदारी दी गई है। पीठ ने कहा कि वर्तमान में ऐसे विशेषज्ञ निकाय होने के कारण इस समय याचिका पर विचार करने का कोई कारण नहीं है। पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया, लेकिन याचिकाकर्ताओं को विधि आयोग के पास जाने की अनुमति दी।
सुप्रीम कोर्ट ने 1985 की पीआईएल का निपटारा किया
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में वायु प्रदूषण से जुड़ी 1985 की जनहित याचिका (पीआईएल) का निपटारा किया। शीर्ष कोर्ट ने हाई कोर्ट की रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में वायु प्रदूषण से जुड़े मामलों पर स्वतः संज्ञान मामला दर्ज करे।
पीआईएल 1985 में पर्यावरणविद् एमसी मेहता की ओर से दायर की थी। इस याचिका पर दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण के स्तर को रोकने, नियंत्रित करने और प्रबंधित करने के लिए कई अहम आदेश और निर्देश दिए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट की पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली शामिल थे।
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का बयान: समलैंगिक पुरुष और वेश्याओं को रक्तदान से रोकने वाले नियम नहीं बदलेंगे
केंद्र ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि विशेषज्ञों ने उन नियमों में बदलाव करने के खिलाफ राय दी है, जो लिंग परिवर्तन वाले व्यक्ति, समलैंगिक पुरुष और वेश्याओं को रक्तदान करने से रोकते हैं। केंद्र ने मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची व न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ को बताया कि पिछले साल मई में कोर्ट के निर्देश के बाद विशेषज्ञों ने इस मामले पर फिर से विचार किया।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा, पुनर्विचारित राय यह है कि अगर इस रोक में ढील दी गई तो दूसरों के लिए हानिकारक होगा। सुप्रीम कोर्ट में 2017 के उन नियमों को चुनौती दी गई थी, जो लिंग परिवर्तन वाले व्यक्ति, पुरुष जो पुरुषों के साथ यौन संबंध रखते हैं और महिला वेश्याओं को रक्तदाता बनने से रोकते हैं। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील जया कोठारी ने कहा कि ये भेदभावपूर्ण नियम लिंग परिवर्तन वाले व्यक्ति के रक्तदान पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा देते हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने पूछा, हमें ऐसा निर्देश क्यों देना चाहिए, कोई एक अच्छा कारण बताइए। पीठ ने कहा कि लाखों गरीब लोग रक्त बैंक की सुविधा का उपयोग करते हैं और वे निजी अस्पतालों का खर्च नहीं उठा सकते। सीजेआई ने पूछा, अगर संक्रमण का केवल एक प्रतिशत भी खतरा हो, तो उन्हें क्यों प्रभावित होना चाहिए? याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि किसी भी व्यक्ति से रक्त लेने पर उसका परीक्षण किया जाता है, जिसमें एचआईवी परीक्षण भी शामिल है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि रक्तदान और स्वीकार करना दोनों ही स्वैच्छिक हैं।