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Supreme Court Updates: हत्या के दोषी को शीर्ष अदालत ने दी जमानत, हाई कोर्ट के आदेश पर जताई गंभीर चिंता

Fri, 08 May 2026 04:39 PM IST
Devesh Tripathi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा उच्च न्यायालय द्वारा पारित एक "परेशान करने वाले" आदेश पर संज्ञान लेते हुए हत्या के एक दोषी को जमानत दे दी है। शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के उस दृष्टिकोण पर गंभीर चिंता व्यक्त की, जिसने देरी के आधार पर दोषी की अपील को खारिज कर दिया था। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय को मामले को व्यावहारिक और सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि से देखना चाहिए था। दोषी को उसकी अपील पर योग्यता के आधार पर बहस करने का अवसर देने के लिए देरी को माफ कर देना चाहिए था।
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सुप्रीम कोर्ट ने यह भी नोट किया कि दोषी को पैरोल या फरलो पर एक बार भी रिहा नहीं किया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि मामले को योग्यता के आधार पर आपराधिक अपील सुनने के लिए उच्च न्यायालय वापस भेजना एक व्यर्थ कवायद होगी। अदालत ने कहा, "हम आश्वस्त हैं कि इस मामले के विशेष तथ्यों और परिस्थितियों में हमें याचिकाकर्ता को जमानत पर रिहा करना चाहिए। इस प्रकार, संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए एक असाधारण मामले के रूप में हम आदेश देते हैं कि याचिकाकर्ता जेल अधीक्षक की संतुष्टि के लिए 10,000 रुपये के व्यक्तिगत बांड निष्पादित करने पर जमानत पर रिहा किया जाए।"

शीर्ष अदालत ने ओडिशा के कोरापुट में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता को अपराध के समय प्रचलित परिहार नीति के अनुसार सजा में छूट की मांग करने वाली एक उपयुक्त याचिका तैयार करने में सहायता करे। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने यह आदेश इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए पारित किया है कि याचिकाकर्ता पिछले 22 वर्षों से सजा काट रहा है, उसे इस अवधि के दौरान एक बार भी रिहा नहीं किया गया है, और उसका जेल आचरण भी संतोषजनक पाया गया है।
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अदालत ने कहा, "रजिस्ट्री जल्द से जल्द कोरापुट स्थित केंद्रीय जेल के वरिष्ठ अधीक्षक और कोरापुट जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को इस आदेश के बारे में सूचित करेगी।" शीर्ष अदालत एक व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें ओडिशा उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसने निचली अदालत द्वारा पारित दोषसिद्धि और सजा के फैसले के खिलाफ आपराधिक अपील दायर करने में 3,157 दिनों की देरी को माफ करने से इनकार कर दिया था, जिससे समय-बाधित होने के आधार पर आपराधिक अपील खारिज हो गई थी।

याचिकाकर्ता पर नवरंगपुर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की अदालत में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), 1860 की धारा 302 और 201 के तहत दंडनीय अपराधों के लिए मुकदमा चलाया गया था। मुकदमे के अंत में, याचिकाकर्ता को कथित अपराध का दोषी पाया गया और उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बंगाल के तीन विश्वविद्यालयों में होगी कुलपति की नियुक्ति
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को पश्चिम बंगाल के राज्यपाल आर एन रवि को तीन राज्य सहायता प्राप्त विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि पूर्व प्रधान न्यायाधीश यू यू ललित की अध्यक्षता वाली खोज-सह-चयन समिति द्वारा चुने गए नामों में से नियुक्तियां की जाएं। इसके साथ ही राज्यपाल और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच 36 राज्य सहायता प्राप्त विश्वविद्यालयों में कुलपति नियुक्ति को लेकर लंबे समय से चल रहा विवाद समाप्त हो गया। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मामले के समाधान पर संतोष जताया। अदालत ने पूर्व प्रधान न्यायाधीश यू यू ललित, अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी और वरिष्ठ अधिवक्ता जयदीप गुप्ता के प्रयासों की सराहना भी की। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सभी औपचारिक प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद चार सप्ताह के भीतर उत्तर बंग विश्वविद्यालय, मौलाना अबुल कलाम आजाद प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय और नेताजी सुभाष मुक्त विश्वविद्यालय में कुलपतियों की नियुक्ति की जाए। इसके बाद अदालत ने 2023 में पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा दायर याचिका का निपटारा कर दिया।

आरोपी की सुविधा के लिए पीड़ितों को परेशान नहीं किया जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दुबई स्थित कारोबारी समीर अग्रवाल की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने उत्तराखंड, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में दर्ज धोखाधड़ी और ठगी के 24 मामलों को एक साथ जोड़कर दिल्ली की अदालत में स्थानांतरित करने की मांग की थी। अदालत ने कहा कि अब समय पीड़ित केंद्रित न्यायिक दृष्टिकोण अपनाने का है। अदालत ने कहा कि आरोपी की सुविधा के लिए पीड़ितों को अलग-अलग राज्यों से दिल्ली बुलाना उचित नहीं हो सकता। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि हर धोखाधड़ी का मामला अलग होता है, क्योंकि हर मामले में पीड़ित और ठगी की रकम अलग-अलग है, भले ही आरोपी एक ही व्यक्ति क्यों न हो। मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि क्या अदालत आरोपी के लिए रेड कारपेट बिछा दे और पीड़ितों को मुकदमे में शामिल होने के लिए दिल्ली आने को मजबूर करे। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे पीड़ित न्यायिक व्यवस्था के अदृश्य पीड़ित बन जाते हैं।

पीठ ने कहा कि यदि आरोपी पीड़ितों की यात्रा और ठहरने का खर्च वहन करने के लिए सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में 1000 करोड़ रुपये जमा करा दे, तब इस तरह की मांग पर विचार किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि पहले आरोपी को समर्पण करना चाहिए और उसके बाद ही इस तरह की राहत मांगनी चाहिए। अदालत ने पूर्व के कुछ फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राथमिकी एकीकृत करने के नाम पर कई बार आरोपी पक्ष को राहत देने वाली व्यवस्था बन गई है। समीर अग्रवाल के खिलाफ उत्तराखंड, हरियाणा और उत्तर प्रदेश की अदालतों में धोखाधड़ी और ठगी से जुड़े 24 आपराधिक मामले लंबित हैं।

पंजाब में नशा चिंताजनक, बड़ी मछलियों को पकड़ना होगा
सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब में मादक पदार्थों के बढ़ते खतरे पर शुक्रवार को चिंता जताई और कहा कि इससे होने वाली मौत के मामले खतरनाक हैं। शीर्ष अदालत ने राज्य में नशीले पदार्थों से निपटने के तरीके में बड़े बदलाव की जरूरत बताई और कहा कि ‘बड़ी मछलियों’ को पकड़ने की जरूरत है। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने हाल की एक घटना का जिक्र किया जिसमें एक मां ने अपने सभी पांच बेटों को नशे की लत की वजह से खो दिया था। पीठ ने कहा कि नशे का खतरा उस स्तर पर पहुंच गया है जहां केंद्र सरकार का हस्तक्षेप आवश्यक हो सकता है। लेकिन जब वे हस्तक्षेप करें, तो यह न सोचें कि केंद्र हस्तक्षेप कर रहा है। सीजेआई ने कहा, साझा लक्ष्य मादक पदार्थों के खतरे पर अंकुश लगाना होना चाहिए। राज्य एवं केंद्रीय कर्मचारियों को इसके लिए मिलकर काम करना होगा। पीठ ने राज्य पुलिस को प्रचार के लिए छोटे-मोटे अपराधियों पर ध्यान केंद्रित करने और बड़े तस्करों को खुलेआम घूमने देने के लिए भी फटकार लगाई। सीजेआई ने कहा, बड़े सरगनाओं या प्रभावशाली लोगों को गिरफ्तार किया जाना चाहिए। लुधियाना इस तरह के व्यापार का केंद्र है।

उन्होंने कहा कि जहां छोटे-मोटे अपराधियों को अक्सर अखबारों में सुर्खियां बटोरने के लिए गिरफ्तार कर लिया जाता है, वहीं इस धंधे को चलाने वाले बड़े सरगना और प्रभावशाली लोग जांच से बच निकलते हैं।  पीठ ने मादक औषधि एवं मनोरोगी पदार्थ (एनडीपीएस) अधिनियम के तहत लंबित मामलों की भारी संख्या पर भी प्रकाश डाला। इस समस्या के समाधान के लिए, पीठ ने सभी राज्यों में एनडीपीएस मामलों के लिए विशेष अदालतों की स्थापना को बढ़ावा देने का संकल्प लिया ताकि मुकदमों की सुनवाई में तेजी लाई जा सके।

आप के सोशल मीडिया अकाउंट निलंबन पर केंद्र से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने आम आदमी पार्टी (आप) की गुजरात इकाई के सोशल मीडिया अकाउंट निलंबित किए जाने पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा की पीठ ने मामले को सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर की उस याचिका से जोड़ दिया है, जिसमें बिना नोटिस अकाउंट ब्लॉक करने को चुनौती दी गई है। गुजरात निकाय चुनावों से ठीक पहले मेटा की तरफ से की गई इस कार्रवाई को आप ने राजनीतिक दबाव और आईटी एक्ट की धारा 79(3)(बी) का दुरुपयोग बताया है। पार्टी का कहना है कि इस धारा का इस्तेमाल सामग्री ब्लॉक करने के लिए नहीं किया जा सकता। अब अदालत तय करेगी कि क्या राजनीतिक दलों के हैंडल बंद करने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देशों की आवश्यकता है।
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आंध्र हाईकोर्ट जज के आदेश पर शीर्ष कोर्ट सख्त, एससीबीए के प्रस्ताव को माना पीआईएल
सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के जज की ओर से एक युवा वकील को 24 घंटे की न्यायिक हिरासत में भेजने के मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए केस दर्ज किया है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) के प्रस्ताव को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार किया। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट के अनुसार, मामले की सुनवाई 15 मई को हो सकती है। एससीबीए ने बुधवार को प्रस्ताव भेजकर सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत से मामले में हस्तक्षेप करने की अपील की थी। एससीबीए के अध्यक्ष विकास सिंह ने प्रस्ताव में कहा कि न्यायिक शक्ति का प्रदर्शन भय पैदा करके नहीं, बल्कि धैर्य और संतुलित व्यवहार से होना चाहिए, खासकर उन युवा वकीलों के साथ जो अभी पेशे को सीख रहे हैं। 5 मई को आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में जस्टिस तारल्यादा राजशेखर रॉय के समक्ष सुनवाई के दौरान युवा वकील को 24 घंटे की न्यायिक हिरासत में भेजा गया। एससीबीए ने कहा, ऐसी कार्रवाई से युवा वकीलों में भय व अपमान की भावना पैदा होती है, जिससे न्याय व्यवस्था की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। एसोसिएशन ने कहा कि अदालतों की गरिमा और अधिकार का सम्मान जरूरी है, लेकिन न्यायिक शक्तियों का इस्तेमाल संयम, निष्पक्षता, संतुलन और संवेदनशीलता के साथ होना चाहिए।
 
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